Tuesday, January 24, 2012

सिर्फ राष्ट्रीय शर्म बताना ही काफी नहीं



लंबे समय से भारत ऐसा देश रहा है, जहां एक ओर तो सम्पन्नता और समृध्दि के द्वीप जगमगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर घोर बदहाली का महासागर हिलोरे मार रहा है। बीते दो दशकों से यानी नव उदारीकृत आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद से यह फासला और बढ़ा है। एक छोटा तबका आला दर्जे के ऐशो-आराम वाली जीवनशैली के मजे ले रहा है और दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में हमारे देश के धनकुबेर शामिल हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को भरपेट भोजन तक मयस्सर नहीं है। हमारे लगभग आधे बच्चे कुपोषित हैं। 'एक ओर देश में हर साल उचित भंडारण के अभाव में लाखों टन अनाज सड़ जाता है जबकि दूसरी ओर करोड़ों भारतीयों को भूखे पेट सोना पड़ता है।' यह कहते हुए कोई एक साल सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई थी लेकिन उसके बाद भी हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। भंडारण की बदइंतजामी के चलते अनाज के सड़ने और लोगों के भूख से मरने का सिलसिला लगातार जारी है।
कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के जरिए भारत में कुपोषण की व्यापकता सामने आ चुकी है और अब एक अन्य सर्वेक्षण ने भी इस भयावह हकीकत की तसदीक की है। कई दलों के सांसदों और विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हस्तियों की एक संस्था द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण की रिपोर्ट जारी करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश में कुपोषण की स्थिति को राष्ट्रीय शर्म का विषय करार दिया है। इस सर्वेक्षण का निष्कर्ष है कि पिछले सात वर्षों में बच्चों में व्याप्त कुपोषण में बीस फीसदी की कमी आई है लेकिन अभी भी देश के 42 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। चूंकि बच्चों को आने वाले कल की बुनियाद माना जाता है, इसलिए यह हमारे लिए बेहद चिंता की बात है, क्योंकि हमारे देश के भविष्य की बुनियाद ऐसे बच्चों के रूप में तैयार हो रही है जो कुपोषित हैं, कमजोर हैं और जिनके बीमार होने की आशंका अधिक है। चूंकि यह सर्वेक्षण देश के महज नौ राज्यों के 112 जिलों में 73 हजार परिवारों को आधार बनाकर किया गया है, लिहाजा इसे देश में कुपोषण की मुक्कमिल तस्वीर नहीं माना जा सकता, जो कि और भी भयावह हो सकती है।
कुपोषण का मतलब केवल भोजन का अभाव नहीं बल्कि इस अभाव से पैदा होने वाली विकृतियां भी हैं। इसका मतलब मजबूरी में मिला ऐसा भोजन जो तात्कालिक रूप से भूख के राक्षस को तो पटक देता है लेकिन जिंदगी की गाड़ी सुचारू रूप से चलाने के लिए शरीर को जिन तत्वों की जरूरत होती है, वे इससे गायब रहते हैं। इसलिए 42 फीसदी बच्चों के कुपोषित होने की हकीकत जानकर शर्म आना तो लाजिमी है ही, देश के भविष्य की सोच कर डर भी लगता है। कुपोषण का यह आंकड़ा देश में गरीबी रेखा से नीचे किसी तरह गुजर-बसर कर रही आबादी के आसपास का है जो बता रहा है कि गरीबों की झोपड़ी में कैसे देश का लाचार-बीमार भविष्य पनप रहा है।  
ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2011 में (दुनिया के 81 विकासशील और पिछड़े मुल्कों में) भारत का स्थान 67 वां है, जबकि बांग्लादेश का 68 वां। दुनिया के महज 14 देश ही हमसे पीछे हैं। चीन, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, वियतनाम जैसे एशियाई देशों के अलावा रवांडा और सूडान, जैसे देश भी इस मामले में भारत से बेहतर स्थिति में नजर आते हैं, जबकि भारत की छवि तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था की बनी हुई है। हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री ने इस बात पर चिंता और हैरानी जताई है कि कई सालों से ऊंची विकास दर हासिल करते रहने के बावजूद ऐसे हालात क्यों बने हुए हैं। दरअसल, ऊंची विकास दर अर्थव्यवस्था की गतिशीलता का पैमाना तो हो सकती है लेकिन यह हाशिए पर जी रहे लोगों की बेहतरी की गारंटी नहीं हो सकती। यही वजह है कि राष्ट्रीय औसत से ज्यादा विकास दर और औद्योगिक रूप से ज्यादा विकसित माने जाने वाले गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में भी कुपोषण की व्यापकता देश के पिछड़े कहे जाने वाले राज्यों जैसी ही है, जिसका खुलासा कुछ दिनों पहले जारी हुई योजना आयोग की मानव विकास रिपोर्ट से हुआ था। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश के एक तिहाई लोग और करीब 50 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।
 प्रधानमंत्री ने कुपोषण की मौजूदा स्थिति को शर्मनाक बताते हुए देश को एक और तल्ख हकीकत से रूबरू कराया है। वह यह कि कुपोषण उन्मूलन के लिए शुरू की गई 'एकीकृत बाल विकास परियोजना' अपेक्षित नतीजे नहीं दे पाई। दुनिया के तमाम गरीब देश कुपोषण की समस्या का सामना कर रहे हैं और संयुक्त राष्ट्र ने इस समस्या के अंत के लिए वर्ष 2015 की डेडलाइन भी तय कर रखी है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अपने देश में इस लक्ष्य का हासिल करने में अभी लगभग चौथाई सदी यानी 25 साल से भी ज्यादा का समय लगेगा। तेजी से विकास कर रहे चीन को देख कर हम भले ही ईष्या या कुंठा पाल लें, लेकिन हमें उस देश से सीखना चाहिए कि उसने अपने यहां कुपोषण खत्म करने का काम संयुक्त राष्ट्र की तय समय सीमा से पहले ही कैसे पूरा कर लिया। हम इस मोर्चे पर कितने मुस्तैद हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कुपोषण के खिलाफ अभियान छेड़ने के लिए खुद प्रधानमंत्री की पहल पर लगभग डेढ़ साल पहले एक उच्च स्तरीय समिति का गठन हुआ था लेकिन आज तक उसकी कोई बैठक ही नहीं हुई। कुपोषण के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए 'आंगनबाड़ी' जैसी योजना भी बनी है लेकिन वह भी उपेक्षा के दलदल से निकल ही नहीं पा रही है। आंगनबाड़ी केंद्रों में कार्यकर्ताओं की कमी, अस्वच्छ वातावरण, शौचालय और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव तथा गंदगी में रखी गई भोजन सामग्री जैसे हालात ने उस योजना का सत्यानाश कर रखा है, जो कुपोषण की समस्या का काफी हद तक उन्मूलन कर सकती थी।
कुपोषण एक तरह से धीमे जहर के समान है जो शरीर को जिंदा तो रखता है लेकिन उसे भीतर से खोखला भी बनाता रहता है। इसकी अनदेखी से भविष्य ही प्रभावित नहीं होता है बल्कि वर्तमान को भी बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों को भी कुपोषण रूपी इस दैत्य से उलझना पड़ा था। मैक्सिको, ब्राजील और घाना जैसे देशों ने इस दैत्य का मुस्तैदी से सामना किया तो उन्हें बेहतर नतीजे भी मिले। प्रधानमंत्री द्वारा समस्या को गंभीर और शर्मनाक बताने भर से उसका निदान नहीं हो सकता। विकास के हमारे मौजूदा मॉडल में आर्थिक प्रगति और विकास का लाभ छनकर समाज के निचले तबकों में अपने आप नहीं पहुंचता। इसीलिए खाद्य सुरक्षा कानून और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी मनरेगा जैसी योजनाओं और कार्यक्रमों की जरुरत पड़ती है। लेकिन अनियमितताओं और भ्रष्टाचार से सनी इन योजनाओं के जरिए किसी तरह हम मानवीय अस्तित्व ही बचा पा रहे हैं, भावी पीढ़ी नहीं। इसलिए भावी पीढ़ी को बचाने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय अभियान की दरकार है जिसमें सरकारों के साथ ही समाज के सक्षम तबकों और कॉरपोरेट जगत को भी उत्साह के साथ आगे आकर शिरकत करनी चाहिए।

Tuesday, January 3, 2012

अण्णा आंदोलन के आगे का रास्ता


भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सशक्त लोकपाल बनाने की मांग को लेकर पहले तीन दिन और फिर बारह दिन का अनशन करने वाले अण्णा हजारे ने तीसरी बार न सिर्फ अपना अनशन बीच में ही खत्म कर दिया बल्कि प्रस्तावित जेल भरो आंदोलन का ऐलान भी वापस ले लिया। उनके इस फैसले के पीछे कई वजहें हैं और उसके कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। इस फैसले में उनकी सेहत का खराब होना भी एक मुख्य वजह है। लेकिन इस आंदोलन को बीच में रोकने के पीछे कहीं न कहीं वैसा अपेक्षित जनसमर्थन न मिलना भी एक कारण है, जैसा गत अगस्त में दिल्ली में रामलीला मैदान में मिला था। दरअसल, कोई भी आंदोलन बगैर जनसमर्थन के कामयाब नहीं हो सकता। अण्णा के आंदोलन को इस बार इसी मुश्किल से रूबरू होना पड़ा है और जो फैसला कुछ पहले लिया जा सकता था उसे लेने में थोड़ी देर हो गई। वैसे किसी भी आंदोलन में गलतियां होना स्वाभाविक है और अण्णा हजारे की टीम से भी गलतियां हुई।
संसद सत्र के दौरान अनशन और फिर जेल भरो आंदोलन का ऐलान किसी भी तरह से तार्किक और औचित्यपूर्ण नहीं था। उन्हें संसद में विधेयक पेश होने और उसके नतीजे का इंतजार करना चाहिए था। वैसे संसद की कार्यवाही के दौरान किसी मुद्दे पर अनशन करना या धरना देना कोई नई बात नहीं है। संसद के हर सत्र के दौरान दिल्ली में कई रैलियां और प्रदर्शन होते हैं। सही समय पर अपनी बात रखना, संसद को सही फैसला करने की चेतावनी लोकतंत्र में अनुचित नहीं कहा जा सकता। लेकिन अण्णा हजारे के आंदोलन पर यह बात लागू नहीं होती, क्योंकि संसद अपने पिछले सत्र में उन्हें आश्वासन दे चुकी थी और उसके बाद भी अण्णा और उनके साथी मीडिया के माध्यम से सरकार को लगभग रोजाना ही चेतावनी दे रहे थे। इसलिए उन्हें संसद के फैसले का इंतजार करना चाहिए था। अण्णा समूह द्वारा आजाद मैदान में अनशन की अनुमति के दायर याचिका को खारिज करते हुए बंबई हाईकोर्ट ने भी इसी आशय की टिप्पणी की थी।
दरअसल अण्णा की टीम रामलीला मैदान के आंदोलन जैसी कामयाबी को मुंबई के एमएमआरडीए मैदान में भी दोहराना चाहती थी, लेकिन मुंबई में अण्णा के अनशन के पहले ही दिन जुटी मामूली भीड़ से उसे इस हकीकत का अहसास हो गया कि इतिहास कभी भी अपने को दोहराता नहीं है। हालांकि अगस्त में अण्णा के समर्थन में रामलीला मैदान में जितने लोग जुटे थे उससे कई गुना ज्यादा लोग ऐसे थे, जिन्होंने सड़कों पर उतरे बगैर ही अण्णा को समर्थन दिया था। इस परोक्ष समर्थन का भाव यह था कि अण्णा और उनके साथी जो कह रहे हैं और कर रहे हैं वह बिल्कुल सही है। अण्णा की टीम को अगस्त में मिले प्रत्यक्ष समर्थन में दिसंबर आते-आते जो कमी आई है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि परोक्ष समर्थन में भी कुछ न कुछ कमी तो आई ही होगी। जनसमर्थन में इस कमी का मतलब यह नहीं लगाया जा सकता कि लोगों का अण्णा हजारे की व्यक्तिगत ईमानदारी या उनकी विश्वसनीयता पर भरोसा कम हुआ है। अण्णा की आंदोलनात्मक रणनीति में कोई गलती हो सकती है, राजनेताओं के बारे में उनके असंयमित बयानों पर भी ऐतराज किया जा सकता है लेकिन उनकी सादगी और ईमानदारी निर्विवाद रूप से असंदिग्ध है। मगर यही बात अण्णा की टीम के बाकी सदस्यों के बारे में कोई दावे से नहीं कह  सकता।
 दरअसल अण्णा के आंदोलन में शुरु से कुछ कमजोरियां रहीं हैं। अण्णा के कुछ सहयोगी तो आंदोलन के चलते मीडिया में अपने को मिले महत्व से इतने अधिक बौरा से गए कि वे अपने को अण्णा से बड़ा नहीं तो उनके समकक्ष तो मानने ही लगे। उनकी दबी-छिपी राजनीतिक दलीय प्रतिबध्दता और महत्वाकांक्षाएं भी हिलोरें मारने लगी। उनके और विपक्षी (भाजपा) नेताओं के सरकार और कांग्रेस विरोधी बयानों में कोई फर्क नहीं रहा। इस तरह के उनके दंभी और निहित स्वार्थ भरे रवैये से कई लोगों को यह अहसास होने लगा कि यह आंदोलन महज भ्रष्टाचार या व्यवस्था के विरुद्घ ही नहीं बल्कि एक पार्टी विशेष के खिलाफ भी हो गया है। हिसार लोकसभा उपचुनाव में उनके कांग्रेस के खिलाफ धुआंधार प्रचार ने भी लोगों के इसी अहसास को पुष्ट किया। खुद अण्णा ने भी जाने-अनजाने अपने बयानों से लोगों के इस अहसास को मजबूत ही किया।
अण्णा ने अपना अनशन और जेल भरो आंदोलन वापस लेने की घोषणा करते हुए कहा है कि वे अब विधानसभा चुनाव वाले पांच राज्यों में जाकर लोगों का आह्वान करेंगे कि वे मजबूत लोकपाल विधेयक के विरोधियों को हराएं। उनका यही फैसला उनके आंदोलन का सबसे बड़ा भटकाव है। यह रास्ता आंदोलन को दलीय राजनीति के रास्ते पर ले जाने वाला है। वैसे राजनीति के रास्ते पर जाने में कोई बुराई भी नहीं है, क्योंकि अगर आप किसी राजनीतिक व्यवस्था से आंदोलन के जरिए कुछ करवाना चाहते हैं तो उस व्यवस्था को चुनाव के मैदान में चुनौती देना भी आंदोलन की एक तार्किक परिणति ही है। मगर, सवाल उठता है कि कौन सी ऐसी पार्टी है जो अण्णा की अपेक्षा के अनुरूप मजबूत लोकपाल चाहती है? संसद में लोकपाल विधेयक पर बहस के दौरान जो कुछ हुआ उसे देखकर तो यही जाहिर हुआ कि कोई भी पार्टी नहीं चाहती थी कि लोकपाल विधेयक पारित हो। सभी पार्टियों की भाव-भंगिमा बता रही थी कि वे तो सिर्फ यह चाहती थीं कि विधेयक पारित न हो पाने की तोहमत उन पर न लगे।
अण्णा ने चुनाव वाले राज्यों में यानी राजनीति के मैदान में जाने का फैसला किया है तो बेहतर होगा कि वे अपने उम्मीदवार भी चुनाव में उतारें। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो वे जो भी मुहिम चलाएंगे, उसका लाभ कांग्रेस विरोधी राजनीतिक पार्टियों को ही मिलेगा। ऐसा होने पर उनके आंदोलन पर लग रहे इस आरोप की पुष्टि ही होगी कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा द्वारा प्रायोजित आंदोलन है। हालांकि चुनाव के नतीजों को अण्णा की अपील प्रभावित कर पाएगी, इस बारे में भी संदेह की पर्याप्त गुंजाइश है। इस संदेह की पुष्टि पिछले दिनों अण्णा के गृह राज्य महाराष्ट्र में हुए स्थानीय निकाय चुनावों से भी होती है, जिनमें अण्णा के मुखर विरोधी शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने अपनी जीत का परचम फहराया है। दरअसल, चुनाव नतीजों को अपने अनुकूल प्रभावित करने के लिए जिस संगठन कौशल और रणनीतिक दांव-पेंचों की दरकार होती है वे अण्णा की टीम के पास नहीं है। अण्णा के सहयोगियों की समस्या यह है कि वे अपने समर्थन में जुटने वाली भीड़ को ही अपनी संगठन-शक्ति मानते हैं।
अण्णा अपने को गांधीवादी मानते हैं। गांधी की शिक्षा के अनुरूप उन्होंने आंदोलन के दौरान लगातार इस बात पर जोर दिया है कि हिंसा न हो। यह अच्छी बात है लेकिन उन्हें गांधी से कुछ और भी सीखना चाहिए। गांधी ने जब भी किसी मुद्दे को उठाया, उसमें सांकेतिक विजय मिलने के साथ ही एक नए मुद्दे को हाथ में लिया। कभी भी किसी आंदोलन को उसकी अंतिम परिणति तक नहीं घसीटा। अण्णा के आंदोलन का अभी तक का सफर कामयाब रहा है। देश का हर व्यक्ति यह मान चुका है कि लोकपाल नाम की एक संस्था देश में होनी चाहिए। यह कोई कम बड़ी कामयाबी नहीं है। लोकपाल विधेयक लोकसभा में जैसे-तैसे पारित होने के बाद राज्यसभा में सरकार व उसके सहयोगी और विपक्षी दलों की बाजीगरी के चलते भले ही पारित न हो सका हो मगर उसके पारित होने की संभावनाएं अभी भी खत्म नहीं हुई है। अब वह संसद के बजट सत्र में पारित हो या बाद में किसी और सत्र में लेकिन उसका पारित होकर कानून बनना तो तय है। भले ही वह अण्णा हजारे के आंदोलन की अपेक्षाओं के पूरी तरह अनुरूप न हो, लेकिन जिस रूप में भी पारित होकर कानून की शक्ल अख्तियार करेगा, उससे कुछ जड़ता तो टूटेगी ही और उसका श्रेय अण्णा के आंदोलन से पैदा हुई देशव्यापी जनचेतना और सरकार तथा राजनीतिक दलों पर बने जनदबाव को ही जाएगा। इसलिए बेहतर तो यही होगा कि अण्णा चुनाव मैदान में इस या उस पार्टी का विरोध करने के बजाय अपने आंदोलन के स्वरूप को व्यवस्था विरोधी ही रखते हुए उसके लिए नई जमीन की तलाश करें। यही गांधी का रास्ता है।

Friday, December 23, 2011

क्योंकि तब बात दूर तलक जाएगी!


पिछले कुछ समय से देश में काले धन का मुद्दा खासा चर्चा में है। लेकिन चर्चा सिर्फ विदेशों के बैंकों में जमा काले धन की ही हो रही है। देश में जमा काले धन और उसके स्रोतों का कहीं जिक्र नहीं हो रहा है। देश को आजादी मिलने के बाद से लेकर आज तक आर्थिक मोर्चे पर जिन गंभीर समस्याओं से मुकाबिल होना पड़ रहा है और उनके लिए जो महत्वपूर्ण कारण गिनाए जा सकते हैं, उनमें एक है काला धन। हालांकि समय-समय पर इस समस्या से निजात पाने के उपाय भी किए जाते रहे हैं लेकिन समस्या लगातार बढ़ती गई है। यानी मर्ज बढ़ता ही गया, ज्यों-ज्यों दवा की। इसकी बड़ी वजह रही राजनीतिक नेतृत्व में इच्छाशक्ति का अभाव। सार्वजनिक जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जो काले धन की बीमारी से बचा हो। रिश्वतखोरी के अलावा हवाला, तस्करी, कर चोरी का भी अवैध धन के उत्पादन में कम योगदान नहीं है। इस तरह देश के संसाधनों और आम लोगों की मेहनत की कमाई को लूटने का खेल बेहद संगठित तौर पर यों तो देश की आजादी के बाद से ही खेला जा रहा है लेकिन दो दशक पूर्व लागू हुई नव उदारीकरण की अर्थनीति के बाद इस खेल में हैरान करने वाली तेजी आई है। इस तरह के हथकंडों से अर्जित धन को छिपा कर या बेनामी या फर्जी नामों से रखा जाता है। इस धन का काफी बड़ा हिस्सा विदेशों के उन बैंकों में भी जमा होता रहा है जो खाताधारी की पहचान गुप्त रखने की गारंटी देते हैं। स्विट्‌जरलैंड के कुछ बैंक इस मामले में दुनिया भर में बदनाम हैं लेकिन अब कई और देशों में भी यह 'सुविधा' उपलब्ध है।
 कुछ दिनों पहले एक अमेरिकी संस्था 'ग्लोबल फाइनेंशियल इंटिग्रिटी' ने भारत के बारे में 1948 से 2008 तक की स्थिति पर जारी अपनी एक शोध रिपोर्ट में कहा है कि आजादी के बाद से भारत को कर चोरी और भ्रष्टाचार के जरिए अब तक 21 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है तथा 1991 के बाद भारत ने जिस तेजी से आर्थिक प्रगति की है, उतनी ही तेजी से भ्रष्टाचार भी बढ़ा है। कुछ समय पहले स्विस बैंक  एसोसिएशन ने भी अपनी एक रिपोर्ट में इस तथ्य की पुष्टि की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक काला धन जुटाने के मामले में भारत दुनिया भर में सबसे अव्वल है और उसका कुल 65,223 अरब स्र्पए का काला धन स्विस बैंकों में जमा है। जबकि दुनिया के सबसे अमीर देश अमेरिका का स्थान इस मामले में काफी पीछे है। जाहिर है कि यह स्थिति किसी देश की समृध्दि को नहीं बल्कि वहां की आर्थिक लूट, अवैध धंधों के फलने-फूलने और कर चोरी के पैमाने को बताती है। यह तथ्य भी गौरतलब है कि आजादी के बाद से जो काला धन भारत से बाहर गया उसमें से आधे से ज्यादा पिछले 15 वर्षों के दौरान गया है। इस अवधि में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन की भी केंद्र में सरकार रही है। लेकिन उसने भी इस सिलसिले को रोकने की दिशा में कुछ नहीं किया, पिछले लोकसभा चुनाव में इसे उसने मुद्दा बनाने की कोशिश भले ही की हो। पिछले कुछ दिनों से यह मांग फिर जोर पकड़ रही है कि देश का जो काला धन देश के बाहर के बैंकों में जमा है उसे वापस लाया जाए। लेकिन इस बारे में सरकार के रवैये से आम लोगों में अगर यह धारणा गहरे तक घर चुकी है कि विदेशों में जमा काले धन को वापस देश में लाने में सरकार की कोई दिलचस्पी नहीं है और सुप्रीम कोर्ट भी इसी तरह का अंदेशा जाहिर कर चुका है तो यह स्वाभाविक ही है।
 विदेशों में जमा काले धन के सवाल पर हाल ही में लोकसभा में विपक्ष के काम रोको प्रस्ताव पर हुई निरर्थक बहस से भी इस बात की पुष्टि हुई है। लगभग छह घंटे तक चली इस बहस में न तो विपक्ष की ओर से कोई नई बात कही गई और न ही सरकार की ओर से। दोनों ओर से वही सब कहा गया जिसे सुनते-सुनते लोगों के कान पक गए हैं। संसद में भारतीय जनता पार्टी  के प्रथम पुरुष लालकृष्ण आडवाणी के लंबे भाषण में वे ही सब बातें थीं, जो वे कालेधन के मुद्दे पर हाल ही में संपन्न अपनी देशव्यापी जनचेतना रथयात्रा के दौरान जगह-जगह पर कह रहे थे। सत्ता पक्ष की ओर से वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने भी उम्मीद के मुताबिक ऐसा कुछ नहीं कहा, जिसे नया कहा जा सके। अंतरराष्ट्रीय संधियों का हवाला देते हुए विदेशों में काला धन जमा करने वाले खातेदारों के नाम सार्वजनिक करने से इनकार करने के साथ ही उन्होंने विदेशों में जमा काले धन पर जल्द ही एक श्वेत पत्र लाने की बात कही जो कि पहले भी कही जा चुकी है। कहा जा सकता है कि इस मुद्दे पर विपक्ष की ओर से काम रोको प्रस्ताव के तहत सरकार को बहस के लिए बाध्य करना एक तरह से महज रस्म अदायगी थी, देश को यह दिखाने के लिए कि देखो, विपक्ष इस सवाल पर कितना गंभीर है।
 अगर ऐसा नहीं होता तो बहस सिर्फ विदेशों में जमा काले धन पर ही नहीं बल्कि देश में जो काले धन के तहखाने हैं, उन पर भी होती और होनी चाहिए। विदेशों में जमा भारत का काला धन बेशक एक गंभीर मुद्दा है लेकिन जितना पैसा विदेशी बैंकों में काले धन के तौर पर जमा है, उससे कई गुना ज्यादा काला धन देश के भीतर ही मौजूद है। देश में आम लोगों की मेहनत की कमाई को लूटने के इस संगठित खेल में भ्रष्ट राजनेता, भ्रष्ट नौकरशाह और बेईमान कारपोरेट घराने शामिल हैं। यह खेल कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 50 फीसदी हिस्से के बराबर काला धन देश में हर साल जमा हो रहा है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के वरिष्ठ प्रोफेसर अरुण कुमार की पुस्तक 'ब्लैकमनी इन इंडिया' के मुताबिक 'देश का जीडीपी लगभग 78 लाख करोड़ रुपए का है जबकि इससे अलग करीब 38 लाख करोड़ रुपए काले धन के तौर पर देश में हर साल उत्पादित हो जाते हैं। जाहिर है, यह खेल पूरे सिस्टम की भागीदारी के बगैर लंबे समय तक कतई नहीं खेला जा सकता। अगर हर साल यह 38 लाख करोड़ रुपए देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ जाएं तो हमारी आर्थिक विकास दर काफी बेहतर हो सकती है।'
 एक साल के भीतर देश में जो 38 लाख करोड़ रुपए का काला धन पैदा होता है, उसमें से महज चार लाख करोड़ रुपए विदेशी बैंकों में काले धन के रूप में जमा होते हैं। बाकी पैसे का निवेश तो देश में ही शेयर बाजार, रियल एस्टेट जैसे कारोबारों में होता है। चूंकि जो काला धन देश में रहता है उसी में से कुछ हिस्सा राजनीतिक दलों को चुनावी चंदे के रूप में मिलता है। कई धर्माचार्यों की व्यासपीठें भी आमतौर पर इसी काले धन के हिस्से से सजती हैं। इसलिए देश में काले धन के व्यवहार के बारे में न तो कोई राजनीतिक दल बोलता है, न ही कोई राजनेता इसके खिलाफ जनचेतना पैदा करने के लिए रथयात्रा निकालता है। भ्रष्टाचार को लेकर चिंतित रहने वाले तथाकथित सिविल सोसायटी के स्वयंभू अलमबरदार, धर्माचार्य और योग गुरु भी इस बारे में अपना मुंह खोलने से बचते हैं। क्योंकि उन्हें डर है कि इस बारे में जिक्र छेड़ा गया तो फिर बात दूर तलक जा सकती है। हाल में भाजपा के सभी सांसदों ने हलफनामे देकर घोषित किया है कि उनका विदेशों में कोई काला धन नहीं है। किसी ने यह घोषणा नहीं की है कि देश के भीतर भी उसने काले धन का कहीं निवेश नहीं कर रखा है। हालांकि राजनेताओं के ऐसे हलफनामों को दिखाने के दांतों से ज्यादा कुछ नहीं माना जा सकता। विदेशों में जमा काला धन तो वापस लाना चाहिए और इसके लिए सरकार को निश्चित रूप से कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिए लेकिन देश के अंदर भी ऐसी कारगर व्यवस्था बनानी चाहिए, जिससे कि काला धन पैदा ही न हो। क्योंकि समस्या की बुनियादी वजह यही है।

Monday, December 12, 2011

सौ बरस की नई दिल्ली


वैसे तो दिल्ली का इतिहास बहुत पुराना है और दुनिया के सबसे प्राचीन शहरों में इसका शुमार है। यह शहर महाभारत काल में इंद्रप्रस्थ के नाम से पांडवों की राजधानी रहा और बाद में यह तुगलक, लोदी, राजपूत और मुगल शासकों की सत्ता का केंद्र भी रहा। लेकिन आधुनिक दिल्ली यानी भारत की लोकतांत्रिक राजसत्ता का केंद्र, जिसे नई दिल्ली कहा जाता है, का इतिहास महज सौ साल पुराना ही है। आज यह शहर अपनी 100 वीं सालगिरह मना रहा है। ठीक सौ साल पहले ब्रिटिश हुक्मरान भारत की राजधानी को कलकत्ता (अब कोलकाता) से स्थानांतरित कर दिल्ली लाए थे और 12 दिसंबर, 1911 को उत्तरी दिल्ली में यमुना नदी के किनारे किंग्जवे कैंप स्थित कोरोनेशन पार्क में भारत के ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम और महारानी मैरी के राज्याभिषेक का जलसा हुआ था, जिसे दिल्ली दरबार कहा गया था। उस जलसे में देश के सभी राजा-महाराजाओं ने अपने पूरे जलवे के साथ शिरकत कर ब्रिटिश सम्प्रभुता के प्रति सम्मान प्रकट किया था। इसके साथ ही हुई थी नई दिल्ली के बसने की शुरूआत और इसके सूत्रधार बने थे अंग्रेज वास्तुविद्‌ एडविन ल्युटियंस। उनकी देखरेख में ही रायसीना पहाड़ी पर बना वायसराय हाउस (अब राष्ट्रपति भवन) और उसके आसपास के धूल भरे विशाल मैदान में इंडिया गेट, संसद भवन, केंद्रीय सचिवालय तथा अन्य प्रशासनिक इमारतें और सड़कें बनीं, जिनके नाम सम्राट अशोक, बाबर, हुमायूं, शेरशाह सूरी, पृथ्वीराज चौहान, मानसिंह, अकबर, जहांगीर, बहादुरशाह जफर, तुगलक, इब्राहिम लोधी, शाहजहां, औरंगजेब, लार्ड कर्जन, डलहौजी आदि शासकों और अंग्रेज प्रशासकों के नाम पर रखे गए। इन सड़कों के किनारे बनीं ब्रिटिश हुकूमत के कारिंदों-मुसाहिबों की कोठियां। इस तरह दिल्ली बन गई शासक वर्ग और सरकारी कारकुनों की नगरी।
 नई दिल्ली की स्थापना के भले ही सौ बरस हुए हों, पर अपने लंबे इतिहास में इस शहर ने पांडवों से लेकर आज तक कई साम्राज्यों और सरकारों का उत्थान-पतन, कई हमलावर शासकों के हमले, विध्वंस और कत्लेआम के मंजर देखे हैं। अपने लंबे इतिहास में दिल्ली कई बार उजड़ी और बसी है। कहा जा सकता है दिल्ली का इतिहास सौभाग्य और दुर्भाग्य का मिलाजुला इतिहास है। इस शहर की जिजीविषा इतनी प्रबल है और इसमें आकर्षण इतना गजब का है कि आज भी यह न सिर्फ देश की राजधानी बनी हुआ है, बल्कि दुनिया के सृजनशील, सुरूचिपूर्ण और ऐतिहासिक धरोहरों से समृध्द चुनिंदा महानगरों में से एक है। यह एक ऐसा अनोखा महानगर है जो अपने स्वभाव में तमाम आधुनिकताओं को समेटे होने के बावजूद अपने शरीर से पुरातन बना हुआ है। हालांकि वक्त के थपेड़ों ने इस शहर के कई ऐतिहासिक स्मारकों और स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूनों की चमक को धुंधला कर दिया है, लेकिन उनकी मौजूदगी ही इस शहर के शानदार अतीत की कहानी सुना देती है। इन ऐतिहासिक इमारतों और स्मारकों की मौजूदगी से यह शहर आज भी दुनियाभर के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है और बार-बार बुलाता है। दुनिया में कुछ चुनिंदा शहर ही हैं जो इस मामले में दिल्ली की बराबरी करते होंगे। इस सिलसिले में मिस्र की राजधानी काहिरा, यूनान की राजधानी एथेंस, इटली की राजधानी रोम और तुर्की के शहर इस्तांबुल का जिक्र दिल्ली के साथ किया जा सकता है। यह देश का इकलौता महानगर है जिसमें इसके प्राचीन रूतबे और वैभव के अवशेषों की झलक देखी जा सकती है, अन्यथा बाकी महानगरों-मुंबई, कोलकाता और चेन्नई का स्वरूप तो आपादमस्तक औपनिवेशिक है। और, ऐसा होने की वजह भी है, क्योंकि इन महानगरों का उदय और निर्माण ही औपनिवेशिक शासनकाल में हुआ था। दिल्ली इन सबसे बिल्कुल अलहदा है, अनूठी है, क्योंकि यह भारतीय सभ्यता, संस्कृति और इतिहास का महत्वपूर्ण केंद्र रही है।
 दिल्ली की मूल संस्कृति और इसके मिजाज पर देश के बंटवारे की दर्दनाक त्रासदी ने आश्चर्यजनक प्रभाव डाला। जहां सिंध और बलूचिस्तान से विस्थापित होकर लाखों की तादाद में आए लोग मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र, खासकर मुंबई में जाकर बस गए, वहीं पश्चिमी पंजाब और सीमा प्रांत से बड़ी संख्या में विस्थापित होकर आए हिंदू-सिख दिल्ली और पूर्वी पंजाब में बस गए। दिल्ली में आए इन विस्थापितों से दिल्ली का चरित्र ही बदल गया। न सिर्फ सामुदायिक चरित्र बदला, बल्कि साहित्य, भाषा, संस्कृति, खान-पान और पहनावे में भी काफी बदलाव और विविधता आ गई।
आज दिल्ली की संस्कृति बहुरंगी हो गई है। यहां अलग-अलग राज्यों से आने वाले अलग-अलग भाषा-भाषी लोगों की जीवनशैली भी दिल्ली की जीवनशैली के साथ एकाकार हो चुकी है। यहां कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरूप तक के हर प्रदेश, हर अंचल के लोगों को लोकजीवन के किसी न किसी क्षेत्र में सक्रिय देखा जा सकता है। लेकिन इस सबके चलते एक खास बात यह हुई कि दिल्ली की अपनी मूल संस्कृति लगभग खो सी गई। देश के बंटवारे और नब्बे के दशक में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण के दौर ने इस संस्कृति का काफी नुकसान किया है।
1911 में दिल्ली की आबादी 2.38 लाख थी। 1947 में बंटवारे की वजह से विस्थापितों के बड़ी तादाद शहर में दाखिल होने से इसकी आबादी बढ़कर 6.96 लाख हो गई। बाद के वर्षों में हर दिशा में दिल्ली के शहरीकरण का विस्तार हुआ, जिससे इसकी आबादी में लगातार इजाफा होता गया। 1991 में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत के साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में रोजगार की तलाश में लोगों का दिल्ली आना शुरू हुआ, जिससे इस शहर की सीमा से लगे इलाकों में अनियोजित आवासीय योजनाओं को लागू करने से शहर का बेतरतीब शहरीकरण हुआ। ऐसा सिर्फ निम्न और निम्न मध्यम वर्ग के लोगों की वजह से ही नहीं हुआ बल्कि रईस और कुलीन वर्ग की भोगवादी लालसाओं का भी इसमें बहुत ज्यादा योगदान रहा। आज दिल्ली की आबादी लगभग 1.5 करोड़ है। बढ़ती आबादी और नव धनाड्‌य वर्ग की भोगवादी इच्छाओं के चलते ही दिल्ली में वाहनों की रेलमपेल भी बेतहाशा बढ़ी। आज दिल्ली की सड़कों पर लगभग 65 लाख वाहन दौड़ते हैं जिनमें कारों की संख्या लगभग 21 लाख है। लोगों और वाहनों की इस भीड़ ने दिल्ली की हवा-पानी को भी बुरी तरह प्रदूषित कर दिया। 
बहरहाल, देश की राजधानी होने के नाते दिल्ली राजनीतिक उठापटक और भागमभाग का अहम केंद्र है। इसी राजनीतिक भागमभाग के माहौल और लोगों में ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की होड़ ने इस शहर की मस्ती और मासूमियत को लील लिया है और कानून-व्यवस्था की स्थिति को चिंताजनक बना दिया है। कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की अध्ययन रिपोर्टें दिल्ली को देश के सबसे असुरक्षित शहरों में शुमार बताती हैं। दिल्ली की शान-ओ-शौकत और इसके पुरसुकून माहौल के मुरीद मशहूर शायर शेख मुहम्मद इब्राहीम 'जौक' ने कभी इठलाते हुए फरमाया था 'कौन जाए जौक दिल्ली की गलियां छोड़कर।' जौक साहब अगर आज होते तो कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो चुकी दिल्ली का सूरत-ए-हाल देखकर निश्चित ही झुंझलाते हुए यहां के लोगों से कह उठते 'जा सकते हो तो चले जाओ दिल्ली की गलियां छोड़कर।'