Tuesday, December 6, 2011

ममोनी बाइदेउ इंदिरा गोस्वामी



महज एक महीने के बाद वर्ष 2011 जिन कारणों से हमारी यादों में शामिल होगा, उनमें कुछ बहुत ही दुखद हैं। इस वर्ष के दौरान साहित्य, संगीत, कला और खेल जगत की कई हस्तियां एक के बाद एक हमसे हमेशा-हमेशा के लिए बिछुड़कर हमारे लोकजीवन को सूना कर गई। महान चित्रकार मकबूल फिदा हुसेन से शुरू हुआ हमें शोकसंतप्त करने का यह सिलसिला पंजाबी के नाटककार गुरशरण सिंह, गजल गायक जगजीत सिंह, फिल्म अभिनेता शम्मी कपूर, नीलू फूले, क्रिकेटर मंसूरअली खान पटौदी, असमिया लोक संगीत के साधक भूपेन हजारिका, प्रतिष्ठित मराठी साहित्यकार विंदा करंदीकर, मशहूर व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल और सारंगी नवाज उस्ताद सुल्तान खां तक होते-होते अब मशहूर असमिया साहित्यकार इंदिरा गोस्वामी तक जा पहुंचा है। असमिया संस्कृति के लिए तो यह भूपेन हजारिका के निधन के बाद सर्वाधिक शोक की बेला है।
अपने गहन और व्यापक सामाजिक व मानवीय सरोकारों के लिए प्रतिबध्द इंदिरा गोस्वामी का निधन सिर्फ असमिया समाज के लिए ही नहीं बल्कि समूचे भारतीय समाज के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है। इंदिरा गोस्वामी का जन्म असम के एक पारंपरिक वैष्णव परिवार में हुआ था जो कि एक मठ का मालिक था। उनका घरेलू नाम था ममोनी रायसम गोस्वामी और असमिया समाज में उन्हें बाइदेउ के नाम से पुकारा जाता था। ममोनी असमिया का शब्द है जिसका अर्थ होता है बिटिया या लाडली और बाइदेउ का मतलब होता है बड़ी दीदी। दिलचस्प है कि उनके जन्म पर एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की थी कि इस कन्या का जन्म अशुभ ग्रहदशा में हुआ है जो अनिष्टकारी हो सकता है, इसलिए इसके टुकड़े कर ब्रह्मपुत्र में बहा देना चाहिए। लेकिन उनके परिवार ने अपने पारंपरिक संस्कारों के बावजूद इस तरह के अंधविश्वास को कुबूल नहीं किया। उनके पिता पढ़े-लिखे और आधुनिक विचारों के थे और रवींद्र संगीत से गहरा लगाव रखने वाली मां भी सुलझे विचारों की थीं। फिर भी अपने जन्म से जुड़ी ज्योतिषी की भविष्यवाणी इंदिरा गोस्वामी कभी भूल न सकीं। भाग्य के इस लेखे को खंडित करने की आकांक्षा उनमें आजीवन बनी रही। आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने असमिया सीखी और फिर वे भारतीय लोक और परंपरा के ब्रह्मपुत्री प्रवाह का हिस्सा बन गईं।
 चूंकि उनका पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा मठ के परिवेश में ही हुई थी, लिहाजा धार्मिक संस्थानों के संचालकों का आचरण, धार्मिक पाखंड और धर्म के नाम पर कुरीतियों का पोषण उन्हें बेहद नजदीक से और खुली आंखों से देखने को मिला। अपने इसी आंखों देखे यथार्थ की आधार-भूमि पर उन्होंने 'दाताल हातिर उने खोवा हौदा' नामक उपन्यास की रचना की। मठों में रहकर गुजारा करने वाली असम की ब्राह्मणी विधवाओं की मार्मिक जीवन-गाथा पर आधारित इस उपन्यास पर बाद में चर्चित फिल्म 'अदाज्य' बनी। इसी समस्या को उन्होंने वृंदावन के आश्रमों में रहने वाली विधवाओं के बीच रहकर और नजदीक से देख-समझकर 'नीलकंठी ब्रज' नामक उपन्यास की रचना की। उनकी यह रचना सिर्फ असमिया साहित्य में ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय साहित्य अपना खास स्थान रखती है।
धर्म के नाम पर चलने वाले पाखंडों के खिलाफ अभिव्यक्ति के खतरों से ब्रह्मपुत्र की यह बेटी बखूबी परिचित थीं। धर्म के स्वयंभू ठेकेदारों की ओर से उन्हें कई बार धमकियां भी मिलीं लेकिन उन्होंने इसके बावजूद कुरीतियों के खिलाफ लिखना बंद नहीं किया। इस सिलसिले में असम के कामाख्या मंदिर में सदियों से चली आ रही पशुबलि की प्रथा के खिलाफ उनका लिखा उपन्यास 'छिन्नमस्तार मानुहतो' काफी चर्चित हुआ, जो बाद में 'छिन्नमस्ता' के नाम से हिंदी में भी खूब लोकप्रिय हुआ। धार्मिक छल-छद्म, अंधविश्वास और कुरीतियों पर अपनी कलम के माध्यम से तीखे प्रहार करते रहने के बावजूद धर्म और परंपरा के प्रति उनका सोच कभी भी इकहरा या एकांगी नहीं रहा। तुलसीदास के रामचरितमानस और चौदहवीं सदी में लिखी गई माधव कंदली की असमिया रामायण का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए उनकी लिखी गई पुस्तक 'रामायण फ्रॉम गंगा टु ब्रह्मपुत्र' इस सिलसिले में उल्लेखनीय कृति मानी जाती है। इसी विषय पर 'माधव कंदली और तुलसीदास का तुलनात्मक अध्ययन' शीर्षक से शोध ग्रंथ की रचना कर उन्होंने पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।  
इंदिरा गोस्वामी प्रखर कहानीकार होने के साथ ही गंभीर अध्येता भी थीं। यही वजह है कि वे समाज की विभिन्न समस्याओं पर लगातार शोध करती रहीं। समाज में आ रहे बदलावों और उनसे उपजी विसंगतियों तथा राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के बीच बुनियादी सुविधाओं के अभाव और बदहाली की जिंदगी से जद्दोजहद कर रहे हाशिए के लोगों की समस्याएं उन्हें लगातार मथती और बेचैन करती रहीं। अपनी इस बेचैनी को उन्होंने अपनी कलम के माध्यम से पूरी शिद्दत के साथ व्यक्त किया। चूंकि मानवता इंदिरा गोस्वामी के लिए सबसे बड़ा जीवन-मूल्य था, इसीलिए 1984 की सिख विरोधी देशव्यापी हिंसा और पूर्वोत्तर में जारी अलगाववाद की समस्या पर भी उन्होंने पूरी शिद्दत के साथ अपनी कलम चलाई। उनके इसी तरह के सरोकारपूर्ण लेखन के लिए उन्हें देश में साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी पुरस्कार समेत कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया।
लेखन कर्म से इतर इंदिरा गोस्वामी ने असम में अपनी-अपनी जातीय अस्मिता के लिए संघर्ष कर रहे लोगों की आकांक्षाओं और उनके असंतोष की टीस को जिस हद तक महसूस किया, वह आज एक मानवाधिकारवादी कार्यकर्ता और शांतिदूत के संघर्ष और कामयाबी के तौर पर दर्ज है। गौरतलब है कि आज केंद्र सरकार और युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के बीच संवाद की स्थिति के साथ असम समस्या के समाधान की उम्मीद की जो किरणें दिखाई दे रही हैं वह इंदिरा गोस्वामी की सक्रिय पहल का ही परिणाम है। यही वजह है कि असम सरकार ने उनके निधन पर राजकीय शोक की घोषणा की और उल्फा के प्रमुख नेता परेश बस्र्आ और अभिजीत बर्मन ने कहा कि पूर्वोत्तर के इतिहास में इंदिरा गोस्वामी को उल्फा के मकसद और फलसफे को केंद्र सरकार तक पहुंचाने के लिए याद किया जाएगा। अपने जुझारू और रचनात्मक लेखन, विचार और कर्म से असमिया संस्कृति को समृध्द करने वाली इंदिरा गोस्वामी के निधन से असम के लोकजीवन में तो एक बहुत बड़ा शून्य पैदा हुआ ही है, उत्तर-पूर्व को शेष भारत से जोड़ने वाला एक पुल भी ढह गया है। इसके साथ ही भारतीय साहित्य में प्रतिबध्द और सरोकारपूर्ण लेखन की धारा भी कमजोर हुई है।

Monday, November 28, 2011

आडवाणी का सफर, सपना और हकीकत


लालकृष्ण आडवाणी की लगभग दो दशक पहले की सोमनाथ से अयोध्या तक की राम रथयात्रा और अभी-अभी सम्पन्न्न हुई जयप्रकाश नारायण के जन्मस्थान सिताबदियारा से दिल्ली तक की जनचेतना रथयात्रा में क्या फर्क और नाफर्क हो सकता है? वैसे इन दोनों यात्राओं के बीच आडवाणी ने इसी तरह की पांच और यात्राएं भी की हैं। उनकी इन सभी यात्राओं का मकसद मोटे तौर राजनीतिक ही रहा है लेकिन सोमनाथ और सिताबदियारा से शुरू की गई यात्राएं कई मायनों में बाकी यात्राओं से भिन्न और ज्यादा महत्वपूर्ण रहीं। राम रथयात्रा के जरिए जहां आडवाणी ने अपने उग्र हिंदुत्ववादी तेवरों से भारतीय राजनीति का ही नहीं बल्कि भारतीय समाज का भी साम्प्रदायिक आधार पर धु्रवीकरण कर दिया था। इसी ध्रुवीकरण के दम पर वे राजनीति के हाशिए पर पड़ी भाजपा को कांग्रेस की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी और सत्ता की दावेदार पार्टी बनाने में कामयाब रहे थे। वहीं सिताबदियारा से शुरू की गई यात्रा उन्होंने भाजपा की राजनीति में अपने को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए की और इसमें भी वे काफी हद तक कामयाब रहे।
समकालीन भारतीय राजनीति के जाने-माने रथयात्री और भाजपा के 'लौह पुरूष' ने अपनी इस चालीस दिन की रथयात्रा के दौरान भौगोलिक रूप से देश का काफी बड़ा दायरा तय किया है। इस दौरान वे देश के लगभग दो दर्जन राज्यों में गए। अपनी इस सातवीं देशव्यापी रथयात्रा के दौरान जनसमर्थन जुटाने में किस हद तक कामयाब रहे, इसको लेकर अलग-अलग आकलन और दावे हो सकते हैं लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि भाजपा में अपनी उस सर्वोच्चता को साबित करने में वे काफी हद तक कामयाब रहे हैं, जिस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परोक्ष रूप से सवाल खड़े करते हुए उन्हें हाशिए पर डालने में जुटा हुआ था और नरेंद्र मोदी जैसे ताकतवर क्षत्रप उन्हें प्रकारांतर से चुनौती दे रहे थे। आडवाणी ने अपनी इस यात्रा के जरिए जहां भाजपा में अपनी सर्वोच्चता साबित की, वहीं  दिल्ली में उनकी यात्रा के समापन के मौके पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के घटक दलों के नेताओं की मौजूदगी से भाजपा के दूसरे तमाम नेताओं और संघ नेतृत्व को भी साफ-साफ संकेत मिल गया कि अटलबिहारी वाजपेयी के राजनीतिक परिदृश्य से अलग हो जाने के बाद आडवाणी ही ऐसे नेता हैं जिनकी राजग में व्यापक स्वीकार्यता है। इस मामले में आडवाणी को भरोसे की असली खुराक तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की ओर से मिली। उन्होंने आडवाणी की दिल्ली रैली में अपने प्रतिनिधि को भेजकर निकट भविष्य में राजग में शामिल होने की संभावनाएं जगाईं।
 संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिन जब आडवाणी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देशव्यापी रथयात्रा निकालने का ऐलान किया था तो भाजपा के बाहर ही नहीं भाजपा के अंदर भी दबे स्वरों में यह अटकलें लगाई जाने लगी थीं कि रथयात्रा के जरिए उनकी असल मंशा खुद को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश करने की है। कम से कम संघ नेतृत्व ने तो उनकी घोषणा को इसी रूप में ही लिया। संघ नेतृत्व आडवाणी के रथयात्रा के फैसले से सहमत नहीं था। उसने इस मामले में आडवाणी को अपनी ओर से 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' तब ही दिया जब आडवाणी ने खुद नागपुर में उसके समक्ष हाजिर होकर अपनी इस यात्रा को प्रधानमंत्री पद की दावेदारी से जोड़कर न देखने की गुहार लगाई और आश्वस्त किया कि उनका मकसद रथयात्रा के जरिए सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार और कालेधन के मुद्दे पर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को घेरना है।
लोकसभा चुनाव में अभी ढाई साल बाकी हैं लेकिन पिछले कुछ समय से भाजपा में शीर्ष स्तर पर पार्टी की ओर से आगामी चुनाव में प्रधानमंत्री पद की  उम्मीदवारी को लेकर नाहक ही एक संघर्ष छिड़ा हुआ था, जो कुछ हद तक अभी भी जारी है। आडवाणी की बढ़ती उम्र को उनकी अयोग्यता मानते हुए यह भी मान लिया गया था कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार अपेक्षाकृत कोई युवा ही संभालेगा। इस विवाद को तब और हवा मिली जब तमाम संभावित उम्मीदवारों के बीच शीतयुध्द की खबरें आने लगीं। लेकिन आडवाणी की यात्रा ने तात्कालिक तौर पर इस विवाद को काफी हद तक ठंडा कर दिया। हालांकि आडवाणी ने यह कभी नहीं  कहा, यहां तक कि नागपुर में संघ नेतृत्व के दरबार में हाजिरी लगाने के बाद भी नहीं कहा कि वे प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल नहीं हैं। अलबत्ता पार्टी की ओर से जरूर कहा जाने लगा कि समय आने पर इस बारे में तय किया जाएगा। यह भी कहा जाने लगा कि पार्टी में प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए कई काबिल नेता हैं। लेकिन जैसे-जैसे आडवाणी का जनचेतना रथ आगे बढ़ता गया, पार्टी का सुर बदलता गया। पार्टी के सभी दिग्गज नेताओं द्वारा आडवाणी के नाम का इस तरह कीर्तन किया जाने लगा मानो इस सवाल का जवाब दिया जा रहा हो कि पार्टी की ओर प्रधानमंत्री पर का उम्मीदवार कौन है। आडवाणी की तारीफ में कशीदे पढ़े जाने का यह सिलसिला रामलीला मैदान पर उनकी यात्रा के समापन तक जारी रहा।
 भाजपा ने 2009 का लोकसभा चुनाव आडवाणी को ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर लड़ा था लेकिन पार्टी को पहले से भी कम सीटें मिली थीं और उसे विपक्ष में बैठना पड़ा। इसके बाद संघ नेतृत्व ने साफ तौर पर आडवाणी को कहा कि वे दूसरी पंक्ति के नेताओं को नेतृत्व संभालने दें और खुद वरिष्ठ राजनेता के तौर पर पार्टी का सिर्फ मार्गदर्शन करें। संघ के हस्तक्षेप से ही नितिन गडकरी पार्टी अध्यक्ष बनाए गए तथा सुषमा स्वराज को लोकसभा तथा अस्र्ण जेटली को राज्यसभा में पार्टी का नेतृत्व सौंपा गया। लेकिन संघ चाहते हुए भी पूरी तरह आडवाणी को किनारे नहीं कर पाया। उनके लिए संसदीय दल के अध्यक्ष का नया पद सृजित किया गया। अब भी संघ की तमाम असहमतियों के बावजूद आडवाणी ने अपनी जनचेतना यात्रा के जरिए एक बार फिर जता दिया है कि अभी वे चूके नहीं हैं और नेतृत्व करने की क्षमता रखते हैं। अपनी जनचेतना यात्रा को भी धुरंधर रथयात्री ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर यों ही केंद्रित नहीं किया। घोटालों के घटाटोप से घिरी यूपीए सरकार को अण्णा हजारे के आंदोलन के असर से लड़खड़ाते देख आडवाणी को लगा कि यही माकूल मौका है जनाक्रोश को भुनाने और अपने को राजनीति के केंद्र में फिर से स्थापित करने का। पूरी रथयात्रा के दौरान आडवाणी ने अपनी कट्टरपंथी और उग्र हिंदूवादी नेता की छवि से छुटकारा पाने की गरज से उन तमाम मुद्दों से भी परहेज किया जिन्हें वे वर्षों तक हर मौके पर शिद्दत से उठाते रहे हैं। यात्रा के दौरान उनके भाषणों से राम मंदिर, धारा 370 और कथित मुस्लिम तुष्टिकरण जैसे तमाम मुद्दे सिरे से नदारद रहे। उन्होंने अपना पूरा फोकस भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे पर ही रखा।
 लेकिन इस सबके बावजूद चालीस दिन तक देशभर में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मनमोहन सिंह की सरकार को कोसते रहे आडवाणी इस मसले पर अपनी पार्टी का कोई ठोस कार्यक्रम देश के सामने पेश नहीं कर पाए। बेशक व्यक्तिगत रूप से आडवाणी की छवि बेदाग कही जा सकती है लेकिन एक पार्टी और गठबंधन के नेता के तौर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी प्रतिबध्दता पर कई सवाल खड़े होते हैं। यह सवाल कोई और नहीं, उनकी ही पार्टी के शासन वाले राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों की कारगुजारियां कर रही हैं। कर्नाटक और उत्तराखंड में उनके मुख्यमंत्रियों को अपनी भ्रष्ट कारगुजारियों के कारण ही सत्ता से बाहर होना पड़ा है। इसके अलावा अन्य भाजपा शासित राज्यों से आ रही नित-नए घोटालों की खबरों पर भी आडवाणी को क्या अपना रवैया स्पष्ट नहीं करना चाहिए और यह भी बताना चाहिए कि विदेशों में जमा जिस काले धन की मांग वे जोर-शोर से कर रहे हैं उस काले धन को वापस लाने के लिए राजग सरकार ने क्या कदम उठाए थे, जिसमें वे स्वयं उपप्रधानमंत्री थे?


Friday, November 18, 2011

यही तो वक्त है सूरज तेरे निकलने का


मालदीव में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (सार्क) की सत्रहवीं शिखर बैठक के मौके पर भारतीय प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी के बीच हुई सौहार्दपूर्ण बातचीत से एक बार फिर दोनों देशों के रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलती दिखाई दे रही है। हालांकि हाल ही में पाकिस्तान द्वारा भारत को औपचारिक रूप से मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएफएन) यानी कारोबार के क्षेत्र में तरजीही देश का दर्जा दे देने के बाद वहां से इस मामले में जो विरोधाभासी बयान आए थे उनसे एक बार तो लगा था कि पाकिस्तान रिश्तों को सुधारने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ने के बाद दो कदम पीछे हट गया है। लेकिन दो-तीन दिन तक बनी रही अनिश्चय की स्थिति के बाद आखिरकार प्रधानमंत्री गिलानी और उनके विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता तेहमीना जंजुआ ने ही साफ किया कि उनका देश भारत को कारोबारी वरीयता देने के लिए प्रतिबध्द है और इससे पीछे हटने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने यह भी कहा कि यह फैसला सेना को विश्वास में लेकर किया गया है तथा वाणिज्य मंत्रालय को इस सिलसिले में औपचारिकताएं पूरी करने के निर्देश दे दिए गए हैं। इन बयानों से जाहिर है कि पाकिस्तान को इस बारे में औपचारिक फैसला करने में भले ही कुछ वक्त और लगे लेकिन उसकी प्रक्रिया शुरू हो गई है।
 दरअसल, भारत को कारोबारी दृष्टि से तरजीही देश का दर्जा देने के बारे में पाकिस्तानी हुकूमत की ओर से जो विरोधाभासी बयान आए थे उसके पीछे उसकी घरेलू मजबूरियां ही खास तौर पर जिम्मेदार हैं जिन्हें आसानी से समझा जा सकता है। यह सही है कि पाकिस्तान के लेखकों, फनकारों और अन्य बुध्दिजीवियों के साथ ही आम अवाम भी चाहता है कि दोनों मुल्कों के बीच दोस्ताना रिश्ते हों। वहां सरकार भी अवाम के द्वारा ही चुनी हुई है लेकिन उस सरकार को एक ओर जहां सेना और जमात-ए-इस्लामी जैसे कई अंध राष्ट्रवादी गुटों के दबाव में काम करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर उसके ही पोषित और संरक्षित आतंकवादी गुट पाकिस्तान को एक राष्ट्र के रूप में ध्वस्त करने में जुटे हुए हैं। इन सारी ताकतों का भारत-विरोध जगजाहिर है और वे कभी नहीं चाहेंगी कि दोनों देशों के बीच दोस्ताना रिश्ते कायम हों
कोई तीन महीन पहले अपनी पहली भारत यात्रा पर आते वक्त पाकिस्तान की युवा विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार ने फरमाया था कि उनका मुल्क इतिहास से सबक जरूर लेगा लेकिन उसकी गुलामी नहीं करेगा। उस वक्त अनेक आलोचकों ने उनके इस बयान को एक अनुभवहीन राजनेता की अति उत्साह में आकर की गई टिप्पणी माना था। लेकिन उनकी उस यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच कई ऐसे मौके आए हैं जब पाकिस्तान ने अपने संजीदा और सकारात्मक रवैये से यही संकेत देने की कोशिश की है कि वह अपने सिर से इतिहास का बोझ उतारकर भारत के साथ अपने रिश्तों का एक नया अध्याय शुरू करना चाहता है। अभी कुछ दिनों पहले ही उसने अपनी सीमा में भटक कर पहुंचे भारतीय सेना के एक हेलीकॉप्टर और उस पर सवार चार सैन्य अधिकारियों को चंद घंटों के अंदर रिहा कर ऐसी ही सदाशयता का परिचय दिया था। इससे पहले भारत ने भी पाकिस्तान को सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य बनने में मदद की थी और पाकिस्तान ने तुर्की के अफगान सम्मेलन में भारत के प्रवेश का समर्थन किया था। और, अब उसने भारत के 15 साल पहले के 'इजहार' पर 'इकरार' करने की पहल करते हुए व्यापारिक रिश्तों को बढ़ावा देने के लिए भारत को 'मोस्ट फेवर्ड नेशन'  का दर्जा देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। 
 भारत ने तो पाकिस्तान को यह दर्जा 1996 में ही दे दिया था लेकिन तब पाकिस्तान कई कारणों से ठिठक गया था और 15 साल तक ठिठका रहा। इसके पीछे कई कारण थे। एक तो भारत के प्रति उस समय की पाकिस्तानी हुकूमत के अपने अपने पूर्वाग्रह थे और इसके अलावा वहां के कट्टरपंथी मजहबी और राजनीतिक समूहों का अंध भारत विरोधी रवैया भी था। वैसे दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों की बुनियाद पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना के समय ही रख दी गई थी लेकिन उनकी मौत के बाद उनके उत्तराधिकारियों ने आमतौर पर भारत विरोधी नजरिया ही अपनाया, जिसके कारण दोनों देशों के व्यापारिक रिश्ते कभी सही ढंग से आकार नहीं ले सके।
दरअसल, पाकिस्तान के सत्ता-प्रतिष्ठान और वहां की कट्टरपंथी सियासी जमातों को हमेशा यह आशंका रही कि यदि उसने भारत से कारोबार के लिए अपने दरवाजे खोल दिए तो भारत से आने वाली अच्छी और सस्ती चीजें पाकिस्तान में छा जाएगी, जिससे पाकिस्तान के उद्योग-धंधे चौपट हो जाएंगे। इसके अलावा भारत के साथ तनाव भरे रिश्तों में ही अपना वजूद तलाशने वाली पाकिस्तानी फौज को भी यह आशंका सताती थी कि यदि दोनों मुल्कों के बीच बगैर किसी बाधा के कारोबार शुरू हो गया तो दोनों के रिश्तों में इतनी गर्मजोशी आ जाएगी कि कश्मीर जैसे मसले अपनी अहमियत खो देंगे। अब इस तरह की तमाम आशंकाओं की कैद से मुक्त होने की कोशिश करते हुए पाकिस्तानी हुकूमत ने व्यापार के क्षेत्र में भारत से रिश्ते बनाने की प्रक्रिया शुरू की है। उसके इस कदम से अब दोनों देशों के बीच न सिर्फ द्विपक्षीय व्यापार बढ़ेगा बल्कि वीजा संबंधी अड़चनें खत्म होने से पेशेवरों को एक देश से दूसरे देश आने-जाने में भी सहुलियत मिलेगी। भारत अब तक पाकिस्तान को महज 1946 वस्तुओं का निर्यात कर सकता था लेकिन अब वह 20 हजार से ज्यादा वस्तुओं का निर्यात कर सकेगा। दोनों देशों के बीच अभी सालाना लगभग 2.6 अरब डॉलर का सीधा व्यापार होता है जो अब सालाना 6 से 8 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इससे उन सामानों की लागत भी कम होगी जो अभी दुबई, ईरान और अफगानिस्तान के जरिए पाकिस्तान पहुंचते हैं। इसके अलावा पाकिस्तान के व्यापारी भारतीय माल को मध्य एशिया के देशों में बेचकर अच्छा मुनाफा कमा सकेंगे और भारतीय व्यापारी भी पाकिस्तान के माल को बांग्लादेश, नेपाल, भूटान आदि देशों में बेच पाएंगे। इस तरह जब दोनों देशों के बीच बड़े पैमाने पर कारोबार होने लगेगा तो दोनों के बीच कश्मीर जैसे सियासी मसले भले ही खत्म न हों, पर उनमें वैसी कर्कशता नहीं रहेगी, जैसी अब तक चली आ रही है।
 हालांकि फिलहाल कारोबारी मोर्चे पर नरमी दिखाने के बावजूद पाकिस्तान के सियासी तेवरों  में विशेष बदलाव नहीं आया है। उसने साफ कर दिया है कि भारत को तरजीही देश का दर्जा देने के बाद भी कश्मीर मुद्दे पर वह अपने पुराने स्र्ख पर कायम रहेगा। उसके ऐसा कहने के पीछे उसकी सियासी मजबूरियों को समझा जा सकता है। जिस कश्मीर को लेकर पाकिस्तानी हुक्मरान पिछले छह दशकों से भारत के खिलाफ हर तरह के नापाक हथकंडे अपनाते रहे हों, अमेरिका से मिलने वाले अरबों डॉलर और हथियारों की मदद को वे अपने यहां चलने वाली आतंकवाद की नर्सरी पर खर्च कर कश्मीर सहित भारत के अन्य इलाकों में खूनखराबा कराते रहे हों, हर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर कश्मीर का मसला उठाकर उस अपना दावा जताते रहे हों, उस कश्मीर के बारे में उनसे यह उम्मीद तो की ही नहीं जा सकती कि वे रातोंरात अपना स्र्ख बदल लेंगे। उनके लिए ऐसा करना मुमकिन भी नहीं है और मुनासिब भी नहीं। पाकिस्तान में हुकूमत चाहे आसिफ अली जरदारी और यूसुफ रजा गिलानी की हो या किसी और की, किसी के लिए भी कश्मीर पर परंपरागत स्र्ख से एकाएक पलटना आसान नहीं हो सकता। जाहिर है कि भारत के साथ रिश्तों में सुधार की कोशिशें उसके लिए निश्चित ही चुनौती भरी हैं। इन मुश्किलों भरे हालात में भारत के साथ कारोबारी रिश्ते बनाने की दिशा में उसका आगे बढ़ना न सिर्फ दोनों देशों के लिए बल्कि समूचे दक्षिण एशिया के लिए बहुत महत्व रखता है। भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलने के आसार बनाते इस दौर में भारत-पाकिस्तान के दोस्ताना रिश्तों के हिमायती मशहूर पाकिस्तानी शायर अहमद फराज का यह शेर काफी मौजूं मालूम होता है- स्याह रात नाम लेती नहीं है खत्म होने का, यही तो वक्त है सूरज तेरे निकलने का।


Tuesday, November 1, 2011

देश के नक्कारखाने में पूर्वोत्तर की चीखें

सुदूर पूर्वोत्तर राज्यों की आवाज दिल्ली आते-आते  कितनी कमजोर हो जाती हैं, इसका ताजा उदाहरण बना हुआ है मणिपुर। आमतौर पर पूर्वोत्तर के राज्यों की ओर दिल्ली यानी केंद्र सरकार और मीडिया के एक बड़े वर्ग का ध्यान तभी जाता है जब वहां कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा आती है या फिर कोई पड़ोसी देश उन सीमावर्ती राज्यों के साथ कोई छेड़खानी करता है। राष्ट्रीय या अखिल भारतीय कहे जाने वाले राजनीतिक दलों या फिर राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता की जोड़तोड़ में शामिल दलों को भी केंद्र में सरकार बनाते या गिराते वक्त ही याद आता है कि पूर्वोत्तर के राज्य भी भारत का ही हिस्सा है, क्योंकि उन्हें वहां से निर्वाचित क्षेत्रीय दलों के सांसदों का समर्थन चाहिए होता है। इसके अलावा उन राज्यों में दैनिक जनजीवन में क्या कुछ होता है और वहां लोगों को किन आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक दुश्वारियों का सामना करना पड़ता है, इससे किसी का कोई सरोकार नहीं होता। यह तथ्य एक बार नहीं, कई बार साबित हुआ है और इस समय मणिपुर के हालात से एक बार फिर साफ-साफ साबित हो रहा है।
बीते कई वर्षों से जारी उग्रवाद और अलगाववाद की लपटों में  बुरी तरह झुलस रहा पूर्वोत्तर का छोटा सा लेकिन खूबसूरत मणिपुर राज्य इस समय अपने सबसे मुश्किल भरे दौर से गुजर रहा है। इस बार उसके सामने संकट उग्रवाद का नहीं बल्कि विभिन्न स्थानीय समुदायों के बीच अपनी पहचान और वर्चस्व को लेकर बढ़ते तनाव का है। एक अलग जिले के गठन के सवाल पर राज्य के कूकी और नगा समुदाय एक दूसरे के खिलाफ खड़े हैं। कूकी समुदाय का संगठन 'द सदर हिल्स डिस्ट्रिक्ट डिमांड कमेटी' नगा बहुल सेनापति जिले को विभाजित कर सदर हिल्स जिले के गठन की मांग कर रहा है। सदर हिल्स इलाका कुकी बहुल सब-डिविजन है। कूकी समुदाय की इस मांग का नगा समुदाय का संगठन 'द युनाइटेड नगा काउंसिल' विरोध कर रहा है। मणिपुर घाटी को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले दो रास्ते हैं जिनमें से एक रास्ता कूकी बहुल इलाके से गुजरता है जबकि दूसरा नगा बहुल इलाके से। दोनों संगठनों ने अपनी-अपनी मांग को लेकर इन रास्तों पर पिछले तीन महीने से भी ज्यादा समय से आर्थिक नाकेबंदी लागू कर रखी है, जिसके चलते मणिपुर घाटी के बाशिंदों खासकर मैतेई समुदाय के लोगों का जीना दुश्वार हो गया है। इस प्रकार राज्य के तीनों प्रमुख समुदाय एक दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए हैं।
 आर्थिक नाकेबंदी की वजह से राज्य के इस इलाके में रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल, दवाइयां जैसी जरूरी वस्तुओं का अभाव हो गया है और कालाबाजारियों और जमाखोरों की बन आई है। वे मनमाने दामों पर चीजें बेच रहे हैं जिसके चलते रसोई गैस का सिलेंडर 1800 स्र्पए में तथा पेट्रोल 100 स्र्पए और डीजल 80 स्र्पए प्रति लीटर में भी मुश्किल से उपलब्ध हो रहा है। आलू और प्याज 50 से 60 स्र्पए किलो तक मिला रहा है। हालात विस्फोटक हो गए हैं और भयावह खूनखराबे को न्योता दे रहे हैं। इस मौके का फायदा उठाने के लिए राज्य में पहले से सक्रिय उग्रवादी संगठन भी तैयार बैठे हैं। अफसोस की बात यह है कि राज्य सरकार किसी समाधान पर नहीं पहुंच पा रही है और केंद्र सरकार भी मूकदर्शक बनी हुई है। सिर्फ केंद्र सरकार ही नहीं, एक राजनीतिक दल के तौर पर कांग्रेस की चुप्पी भी कम अफसोसनाक नहीं है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में किसानों पर लाठीचार्ज होता है तो वहां पदयात्रा करने पहुंच जाते हैं। बिहार में जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे लोगों पर पुलिस फायरिंग होती है तो वे वहां का भी दौरा कर आते हैं, लेकिन उन्हें मणिपुर बिल्कुल याद नहीं आता।
 देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी और जल्द से जल्द जैसे भी हो, सत्ता में आने को बेताब भारतीय जनता पार्टी के एजेंडा में भी मणिपुर या पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए कोई खास जगह नहीं है। हां कभी-कभी उसे असम की याद जरूर आ जाती है। वहां वह बांग्लादेशी शरणार्थियों और वहां के कथित घुसपैठियों का मुद्दा उठा कर राज्य की राजनीति में साम्प्रदायिक धु्रवीकरण की कोशिश करती रहती है। लेकिन मणिपुर या अस्र्णाचल प्रदेश, मिजोरम, नगालैंड में उसके लिए इस तरह की राजनीति की कोई गुंजाइश नहीं रहती है, इसलिए इन राज्यों की ओर सामान्यतया उसका ध्यान नहीं जाता है। हां, इन राज्यों में ईसाई मिशरियों की गतिविधियों और यदा-कदा होने वाली धर्मातंरण की घटनाओं को लेकर वह अपनी हिन्दुत्व जनित परेशानी का इजहार जरूर कर देती है। जहां तक वामपंथी दलों और विभिन्न दलों में बंटे समाजवादियों की बात है तो वामपंथी तो अभी तक पश्चिम बंगाल और केरल में मिली हार के सदमे से ही उबर नहीं पाए हैं और समाजवादियों के लिए तो अब मानो उत्तर प्रदेश और बिहार ही पूरा देश है। डॉ. लोहिया, मधु लिमए और सुरेंद्र मोहन के बाद मणिपुर जैसे सवालों पर सोचने और बोलने वाला कोई नेता या चिंतक अब समाजवादियों में है ही नहीं।
 सवाल सिर्फ मणिपुर में इन दिनों चल रही आर्थिक नाकेबंदी का ही नहीं है, पूर्वोत्तर के राज्यों से जुड़ा इस तरह का जब भी कोई मामला आता है तो क्या सरकार, क्या राजनीतिक दल और क्या मीडिया कोई भी उसे कभी गंभीरता से नहीं लेता। मणिपुर की ही इरोम शर्मिला चानू हैं जिनके अनशन को आगामी चार नवंबर ग्यारह वर्ष पूरे हो रहे हैं। उनकी मांग है कि मणिपुर में लागू सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून हटाया जाए क्योंकि इस कानून की आड़ में वहां तैनात सशस्त्र बलों के जवान निर्दोष लोगों के साथ गुलामों जैसा बर्ताव करते हैं और उनके द्वारा महिलाओं का अपहरण और बलात्कार किया जाना आम बात है। पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में यह कानून लागू है। इरोम शर्मिला के आरोपों की जांच करने की जहमत भी कभी सरकार ने नहीं उठाई। मणिपुर हो या जम्मू-कश्मीर जब भी वहां तैनात सशस्त्र बलों पर फर्जी मुठभेड़ में किसी को मार दिए जाने, लूटपाट करने या महिलाओं से बलात्कार करने के आरोप लगते हैं और उनकी जांच कराने की मांग उठती है तो सरकार का एक ही घिसापिटा जवाब होता है कि ऐसा करने से सशस्त्र बलों का मनोबल गिरेगा। जनता के मनोबल का क्या होगा, इस बारे में सरकार कभी नहीं सोचती। अपने इसी रवैये के चलते दिल्ली में भ्रष्टाचार और जन लोकपाल के सवाल पर अनशन करने वाले अण्णा हजारे और बाबा रामदेव के आगे सिर के बल खड़ी हो जाने वाली सरकार और उनके अनशन का चौबीसों घंटे लाइव प्रसारण करने वाले टीवी चैनलों ने कभी शर्मिला की सुध लेने की जहमत नहीं उठाई। अण्णा हजारे और बाबा रामदेव की पालकी के कहार बनने को आतुर रहने वाले राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी कभी शर्मिला से मिलना मुनासिब नहीं समझा। सिर्फ इसलिए कि मणिपुर छोटा सा राज्य है और वहां से लोकसभा के सिर्फ दो सदस्य चुने जाते हैं।
 दरअसल, असम के अलावा पूर्वोत्तर के बाकी सभी राज्यों की आबादी जनजाति बहुल है। वहां के लोगों की कद-काठी और चेहरे-मोहरे, उनकी संस्कृति, उनकी सामाजिक परंपराए, रीति-रिवाज और उनकी भाषाएं शेष भारत के लोगों से काफी अलग है। इसीलिए न तो शेष भारत खासकर उत्तर भारत के लोग उन्हें अपनी ही तरह भारत का नागरिक मानते हैं और न ही वे लोग शेष भारत के लोगों के साथ अपना जुड़ाव कायम कर पाते हैं। इस दूरी को पाटने और समूचे पूर्वोत्तर के लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए सरकार की ओर से भी राजनीतिक व सामाजिक संगठनों की ओर से भी कभी कोई संजीदा पहल नहीं की गई। कहने की आवश्यकता नहीं कि पूर्वोत्तर को हम सिर्फ भारतीय भू भाग का हिस्सा भर मानते हैं। भावनात्मक तौर पर यह अलगाव ही भौगोलिक अलगाव को बढ़ावा देता है। इस अलगाव के चलते ही कभी चीन अस्र्णाचल पर अपना दावा कर देता है तो कभी नगालैंड और मिजोरम के लोग देश से अलग होने की बात करते हैं। पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में बने अलगाववादी संगठन और वहां चलने वाली उग्रवादी गतिविधियों के लिए सबसे ज्यादा अगर कोई जिम्मेदार है तो वह है केंद्र सरकार और राजनीतिक दलों का उपेक्षित रवैया तथा शेष भारत के लोगों की तंगदिली और स्वार्थीपन।

Tuesday, October 25, 2011

दीपावली की सामाजिकता को चट करता बाजार

 दीपावली का पर्व अमावस्या को मनाया  जाता है और इस दिन दीये जलाए जाते हैं, इससे यह प्रतीक बेहद लोकप्रिय हो गया है कि यह अंधकार पर प्रकाश की और असत्य पर सत्य की विजय का पर्व है। इस प्रतीकवाद की पुष्टि के लिए ही संस्कृत की उक्ति 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' पेश की जाती है। यह एक ऐसा प्रतीकवाद है, जो आधुनिक भारतीय चित्त को बहुत भाता है, क्योंकि इससे उसका राष्ट्रीय और सामाजिक गौरव बढ़ता है। ज्यादा सच तो यह प्रतीत होता है कि चौदह वर्ष के वनवास की अवधि समाप्त कर और रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद राम के अयोध्या लौटने पर दीपावली मनाने की परंपरा शुरू हुई। इस लिहाज से यह सुशासन कायम होने का उत्सव है। भारत में सुशासन की कल्पना राम-राज्य से जुड़ी रही है। लेकिन हमारे देश ने इतने लंबे समय तक सुशासन ही नहीं, शासन का भी ऐसा नितांत अभाव देखा है कि राम-राज्य की कसक उसके अंतर्मन में बैठ गई है। आम देशवासियों के इस स्वप्न को जिस व्यक्ति ने पुनर्जाग्रत किया, उसका नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। आजादी के बाद देश की जनता को महात्मा गांधी की कल्पना के अनुरूप राम-राज्य नहीं मिला। उसे जो मिला था, वह शुध्द कांग्रेस राज था। लंबे समय तक चले और आज भी जारी इस कांग्रेसी राज के बीच-बीच में थोड़े समय के लिए तथाकथित जनता राज (जनता पार्टी का शासन) भी आया और फिर तथाकथित रामभक्तों (भाजपा-एनडीए) का राज भी आया लेकिन देश का सुशासन से परिचय नहीं हो सका तो नहीं हो सका। उसे मिला तो सिर्फ घपले-घोटालों और भाई-भतीजावाद का राज, जो आज अपने भयावह रूप में सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, विभिन्न राज्यों में भी जारी है। घोटालों का जो घटाटोप देश पर छाया हुआ है उसके खत्म होने के आसार कहीं से भी नजर नहीं आ रहे हैं। 
वैसे दीपावली खास तौर पर लक्ष्मी की पूजा-आराधना का पर्व है। लक्ष्मी यानी धन-धान्य और ऐश्वर्य की देवी। इस आधार पर हमारा भारत जितना आध्यात्मिक है उतना ही भौतिकवादी देश भी है। हम ज्ञान के साथ-साथ ही समृद्धि की भी उपासना करते आए हैं, क्योंकि हमें परलोक को ही नहीं, इस लोक को भी सुंदर और सफल बनाना है। लक्ष्मी भगवान विष्णु की पत्नी हैं। हमारे धर्म-शास्त्रों में विष्णु को इस सृष्टि का सूत्रधार माना गया है। वही सृष्टि का संचालन और पालन-पोषण करते हैं। जाहिर है कि इस दायित्व का निर्वाह वह अकेले नहीं कर सकते। इसमें उन्हें अपनी पत्नी लक्ष्मी का सहयोग चाहिए। इन पौराणिक प्रतीकों के माध्यम से हमारे शास्त्र-रचयिता ऋषियों-मनीषियों ने संभवतः यह संदेश देना चाहा हो कि हमें धन की उपासना तो अवश्य करनी चाहिए लेकिन वह उपासना इस तरह हो, जैसे पूजा की जा रही हो। अर्थात्‌ भौतिकता के साथ पवित्रता का भाव भी जुड़ा हुआ हो। अनैतिक साधनों से अर्जित किया गया धन जीवन में अभिशाप ही पैदा करता है। इसकी पुष्टि हमारे देश के मौजूदा हालात देखकर भी होती है। देश ने विदेशी दासता से स्वतंत्र होते ही धन की उपासना शुरू कर दी थी। देशी शासकों ने देशवासियों को सुखी और समृद्ध बनाने के लिए तरह-तरह के यत्न शुरू किए। पंचवर्षीय योजनाएं बनाई जाने लगी। स्पष्ट तौर पर यह उपासना समाजवादी संपन्नता की थी। लेकिन चूंकि इसके लिए अपनाए गए तौर-तरीके कतई समाजवादी नहीं थे, इसलिए गरीबी के विशाल हिन्द महासागर में समृद्धि के कुछ टापू ही उभर पाए। वर्ष 1991 में विदेशी मुद्रा भंडार के खाली हो जाने से उपजे संकट ने हमारी अर्थव्यवस्था की दिशा ही बदल दी। तब के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव और वित्त मंत्री (मौजूदा प्रधानमंत्री) डॉ मनमोहन सिंह की जोड़ी ने उदारीकरण यानी बाजारोन्मुख अर्थव्यवस्था का रास्ता अपनाया, जो कि पूंजीवाद का ही नया संस्करण है। तब से लेकर आज तक हम एकाग्रभाव से बाजारवाद की ही पूजा-अर्चना कर रहे हैं। लक्ष्मी अब लोक की देवी नहीं, बल्कि ग्लोबल प्रतिमा बन गई हैं। उसकी पूजा में अब लोक-जीवन को संपन्न बनाने की इच्छा कम और खुद को समृद्ध बनाने की लालसा ज्यादा व्यक्त की जाती है। डिजायनों और ब्रांडों के बोलबाले ने मिट्टी की लक्ष्मी प्रतिमाओं और कुम्हार के कलाकार हाथों से ढले दीयों को भी डिजायनर बना दिया है। डिजायनर दीयों के साथ ही ब्रांडेड मोमबत्तियां और मोम के दीयों का भी चलन बढ़ गया है। पारंपरिक मिठाइयों की जगह अब ब्रांडेड मिठाइयों और चॉकलेटों ने ले ली है। दीपावली पर उपहारों और मिठाइयों के आदान-प्रदान का चलन पुराना है लेकिन पहले उनमें आत्मीयता होती थी। अब जिन महंगे उपहारों या मिठाइयों का लेन-देन होता है उनमें से आत्मीयता और मिठास का पूरी तरह लोप हो गया है और उनकी जगह ले ली है दिखावे और स्वार्थ ने। यानी अब राजनीति के साथ-साथ हमारी संस्कृति और सामाजिकता भी बाजार के रंग में रंग गई है। दीपावली समेत हमारी लोक-संस्कृति से जुड़े तमाम त्योहारों, पर्वो और यहां तक कि महिलाओं द्वारा किए जाने वाले करवा चौथ और हरतालिका तीज जैसे व्रतों को भुनाने में भी बाजार अब पीछे नहीं रहता हैं। 
निस्संदेह बाजारवाद से देश में समृद्धि का एक नया वातावरण निर्मित हुआ है। महानगरों में एक बड़े वर्ग के बीच हमेशा उत्सव का माहौल रहता है। लेकिन उनके इस उत्सव में न तो बहुत ज्यादा सामाजिकता होती है और न ही इसके पीछे किसी प्रकार की कलात्मकता। उसमें जो कुछ होता है, उसे भोग-विलास या आमोद-प्रमोद का फूहड़ और बेकाबू वातावरण ही कह सकते हैं। यह सब कुछ अगर एक छोटे से तबके तक ही सीमित रहता तो, कोई खास हर्ज नहीं था। लेकिन मुश्किल तो यह है कि 'यथा राजा-तथा प्रजा' की तर्ज पर ये ही मूल्य हमारे राष्ट्रीय जीवन पर हावी हो रहे हैं। जो लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं या जिनकी आमदनी सीमित है, उनके लिए बैंकों ने 'ऋणं कृत्वा, घृतम्‌ पीवेत' की तर्ज पर क्रेडिट कार्डों और कर्ज के जाल बिछा कर अपने खजाने खोल रखे हैं। लोग इन महंगी ब्याज दरों वाले कर्ज और क्रेडिट कार्डों की मदद से सुख-सुविधा के आधुनिक साधन खरीद रहे हैं। विभिन्न कंपनियों के शोरूमों से निकलकर रोजाना सड़कों पर आ रहीं लगभग पांच हजार कारों और शान-ओ शौकत की तमाम वस्तुओं की दुकानों और शॉपिंग मॉल्स पर लगने वाली भीड़ देखकर भी स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। कुल मिलाकर हर तरफ लालसा का तांडव ही ज्यादा दिखाई पड़ रहा है। तृप्त हो चुकी लालसा से अतृप्त लालसा ज्यादा खतरनाक होती है। देशभर में बढ़ रहे अपराधों-खासकर यौन अपराधों की वजह यही है। यह अकारण नहीं है कि देश के उन्हीं इलाकों में अपराधों का ग्राफ सबसे नीचे है, जिन्हें बाजारवाद ज्यादा स्पर्श नहीं कर पाया है। यह सब कहने का आशय विपन्नता का महिमा-मंडन करना कतई नहीं है, बल्कि यह अनैतिक समृद्धि की रचनात्मक आलोचना है। ऐसी आलोचना नहीं होनी चाहिए क्या?  

Sunday, October 23, 2011

येदियुरप्पा उर्फ भाजपा की कलंक कथा

प्रधानमंत्री  बनने की अपनी चिर-परिचित हसरत के साथ भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस और उसके नेतृत्व  वाली केंद्र की यूपीए सरकार  की घेराबंदी करने के लिए एक बार फिर देशव्यापी रथयात्रा पर निकले भारतीय जनता पार्टी के महारथी लालकृष्ण आडवाणी और उनके सहयोगियों को अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि उनकी नैतिकता का रथ इतनी जल्दी अपने ही घर में फैले भ्रष्टाचार के दलदल में फंस जाएगा। मध्य प्रदेश के सतना शहर में आडवाणी की रथयात्रा के सिलसिले में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज्य सरकार के एक मंत्री समेत भाजपा नेताओं द्वारा पत्रकारों को पैसे बांटने का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि भ्रष्टाचार के आरोपों में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को जेल जाना पड़ गया। उनके जेल जाने से आडवाणी और पार्टी के दूसरे बड़े नेता ही नहीं, समूचा संघ परिवार सकते में हैं। कहां तो वे कांग्रेस को घेरने निकले थे और कहां अब उनकी ही पार्टी के एक क्षत्रप की कारगुजारी ने उन्हें आईना देखने पर मजबूर कर दिया है।
कोई साढ़े तीन साल पहले जब कर्नाटक  में भाजपा सत्ता में  आई थी तो यह किसी भी अन्य राज्य  की तुलना में उसके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। दक्षिण भारत में अपनी सरकार बनाने की उसकी हसरत परवान चढ़ी थी। लेकिन सत्ता में आने के बाद जो कुछ हुआ वह सत्ता के दुस्र्पयोग और भ्रष्टाचार की हैरतअंगेज दास्तान है। अवैध खनन के बारे में ढाई महीने पहले राज्य के तत्कालीन लोकायुक्त संतोष हेगड़े की रिपोर्ट आने के बाद येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था और अब भूमि घोटाले में उनकी लिप्तता के आरोप ने उन्हें जेल के सींखचों के पीछे पहुंचा दिया है। दक्षिण भारत में अपने बूते भाजपा को पहली बार सत्ता का आस्वादन कराने वाले कद्दावर नायक से खलनायक बने येदियुरप्पा कर्नाटक के पहले और देश के ऐसे पांचवें पूर्व मुख्यमंत्री हो गए जिन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते बेआबरू होकर सींखचों के पीछे जाना पड़ा। इसके पहले महाराष्ट्र के अब्दुल रहमान अंतुले, तमिलनाडु की जयललिता, बिहार के लालू प्रसाद यादव और झारखंड के मधु कोड़ा इसी तरह के आरोपों के चलते जेल की हवा खा चुके हैं।
कांग्रेस  और पूर्व  प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के जनता दल (सेक्यूलर) के कुशासन से त्रस्त कर्नाटक  की जनता से सुशासन देने का वादा कर सत्ता में आए येदियुरप्पा  बहुत जल्द अपने भ्रष्टाचरण की गाथा लिखने में मशगूल हो गए थे। उन्होंने बेखौफ होकर अपने परिजनों, रिश्तेदारों और मित्रों को बेशकीमती सरकारी जमीन कौड़ियों के भाव दे दी, विधानसभा में बहुमत बनाए रखने के लिए निर्दलीय और विपक्षी विधायकों की खरीद-फरोख्त की और पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के दुलारे बेल्लारी के बदनाम रेड्डी भाइयों को राज्य की बेशकीमती खदानों का मालिक बना दिया। इस सबकी तार्किक परिणति हुई मुख्यमंत्री पद से उनकी स्र्खसती में। वैसे यह तथ्य बहुत पहले ही जगजाहिर हो चुका था कि मुख्यमंत्री पद का दुस्र्पयोग करते हुए येदियुरप्पा ने अपने परिजनों और चहेतों को उपकृत किया है। अगर तभी भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उनसे पिंड छुड़ा लेता तो आज पार्टी की ऐसी भद नहीं पिटती। लेकिन जब तक बन पड़ा पार्टी उनका बचाव करती रही। पार्टी की ओर से कभी कर्नाटक के प्रभारी रहे वरिष्ठ नेता शांता कुमार के एक बयान से भी इसकी तसदीक होती है। तत्कालीन लोकायुक्त की रिपोर्ट आने के बाद मची सियासी उथल-पुथल के दौरान शांता कुमार ने कहा था कि उन्होंने इस बारे में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को पहले ही आगाह कर दिया था। लेकिन पार्टी सब कुछ जानते हुए भी मूकदर्शक बनी रही, जब तक कि येदियुरप्पा पार्टी के गले की फांस नहीं बन गए।
 येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री रहते हुए जो कुछ धतकरम किए उसमें उन्होंने तो किसी तरह का शर्म-संकोच नहीं ही किया, लेकिन उनके सारे किए-धरे को नजरअंदाज करने में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने भी कम निर्लज्जता नहीं दिखाई। जमीन आवंटन से संबंधित मामले में जब येदियुरप्पा पर आरोप लगे थे तब भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने तो यह कहते हुए निहायत बेशर्मी के साथ उनका बचाव किया था कि येदियुरप्पा ने जो किया है, वह अनैतिक तो है पर गैरकानूनी नहीं। जाहिर है कि भाजपा येदियुरप्पा को छेड़ने में हिचकिचा रही थी। उसे डर था कि ऐसा करने से येदियुरप्पा के वफादार विधायक बगावत पर उतर आएंगे। भाजपा अक्सर दूसरे दलों पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाती रहती है मगर कर्नाटक के प्रभावशाली लिंगायत समुदाय का समर्थन खो देने के डर से वह येदियुरप्पा के साथ नरमी बरतती रही। पार्टी नेतृत्व को लग रहा था कि येदियुरप्पा के वफादार विधायकों की बगावत से दक्षिण भारत में बड़ी मुश्किल से बनी पार्टी की पहली सरकार बेमौत मारी जाएगी और लिंगायत समुदाय के पार्टी से दूर हो जाने  पर भविष्य में दोबारा वहां सत्ता में लौटना मुश्किल हो जाएगा।
 पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ में एक वस्तुपरक बयान देने पर आडवाणी को भाजपा का अध्यक्ष पद छोड़ देने पर मजबूर कर देने वाले संघ नेतृत्व ने भी येदियुरप्पा के भ्रष्ट कारनामों को पूरी तरह नजरअंदाज किया। संघ अपने को चरित्र निर्माण की पाठशाला कहता रहता है लेकिन उसके निष्ठावान स्वयंसेवक येदियुरप्पा पर लगे आरोप और उनकी गिरफ्तारी बताती है कि संघ अपने स्वयंसेवकों का किस तरह का चरित्र निर्माण करता है। लोकायुक्त की अदालत ने येदियुरप्पा की गिरफ्तारी का आदेश ऐसे वक्त जारी किया, जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा केंद्र सरकार और कांग्रेस को घेरने में जी-जान से जुटी हुई है। लालकृष्ण आडवाणी तो जनचेतना रथ पर सवार होकर कांग्रेस और केंद्र सरकार पर हमले बोल ही रहे हैं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी अण्णा हजारे के आंदोलन का श्रेय लूटने में पीछे नहीं है।
येदियुुरप्पा  की गिरफ्तारी ने सुराज  और सुशासन का मंत्रोच्चार करने वाले रथयात्री आडवाणी के लिए बेहद असहज स्थिति पैदा कर दी है। यह अकारण नहीं हैं कि प्रतिदिन अपनी यात्रा प्रारंभ करने से पूर्व संवाददाताओं से बतियाने वाले आडवाणी को येदियुरप्पा की गिरफ्तारी के अगले दिन भोपाल पहुंचने पर अपना गला खराब होने आड़ लेते हुए प्रेस कांफ्रेंस रद्द करनी पड़ी। लेकिन अगले दिन नागपुर में उन्हें हिम्मत जुटा कर कहना पड़ा कि येदियुरप्पा को पार्टी ने पहले ही सचेत किया था, लेकिन वे नहीं चेते और उनकी कारगुजारियों के लिए पार्टी को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है। यह विडंबना ही है कि आडवाणी की इस साफगोई से पार्टी के दूसरे नेता अपने को असहज महसूस कर रहे हैं। वे अभी भी येदियुरप्पा के प्रति अपना मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं। पार्टी महासचिव और प्रवक्ता जेपी नड्डा ने साफ कहा है उनकी गिरफ्तारी महज एक कानूनी मसला है, इसलिए कानून अपना काम करेगा लेकिन पार्टी पूरी तरह येदियुरप्पा के साथ है। इतना ही नहीं, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा सहित राज्य सरकार के तमाम मंत्री येदियुरप्पा के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। वैसे इसमें अचरज की कोई बात नहीं है। भ्रष्टाचार के खिलाफ बने देशव्यापी माहौल में कांग्रेस के खिलाफ सियासी बढ़त हासिल करने के लिए येदियुरप्पा भले ही हटा दिए गए लेकिन सदानंद गौड़ा को उनकी मर्जी से ही उनका उत्तराधिकारी बनाना गया। जो पार्टी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में फंसे अपने एक नेता की पसंद-नापसंद का इतना ध्यान रखती हो, वह किस नैतिक धरातल पर खड़ी होकर भ्रष्टाचार से लड़ने का दावा कर सकती है?
 देश अभी भूला नहीं है कि अवैध खनन में भागीदारी और सरकारी जमीन की हेराफेरी के सिलसिले में येदियुरप्पा को लोकायुक्त की रिपोर्ट में साफ तौर पर दोषी करार दे दिए जाने के बाद पार्टी नेतृत्व ने जब मजबूर होकर येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटने का फरमान जारी किया था तो येदियुरप्पा ने किस तरह लिंगायत समुदाय में अपनी पैठ को अपने राजनीतिक सुरक्षा कवच की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश करते हुए पार्टी नेतृत्व को बागी तेवर दिखाए थे और फिर मजबूरन इस्तीफा देने के बाद अपने 'विश्वस्त' को मुख्यमंत्री बनवाकर सत्ता में अपनी वापसी का रास्ता खुला रखना चाहा था। लेकिन अदालत के आदेश पर हुई उनकी गिरफ्तारी ने उनके इस मंसूबे पर पानी फेर दिया है। मुख्यमंत्री पद से जेल तक येदियुरप्पा का यह सफरनामा भाजपा के लिए निश्चित तौर पर एक बड़ा झटका तो है ही, एक सबक भी है। सबक यह कि भ्रष्टाचार के मसले पर दूसरों पर पत्थर उछालने के पहले अपने घर को दुस्र्स्त करना होगा। येदियुरप्पा प्रकरण ने मुख्यमंत्रियों के विवेकाधिकारों के औचित्य पर भी सवाल खड़े किए हैं लेकिन भाजपा ने अभी तक इस बारे में ऐसा कोई नीतिगत फैसला नहीं किया है और न ही करने का इरादा जताया है जो मुख्यमंत्रियों के विवेकाधीन कोटे के दुस्र्पयोग पर अंकुश लगने का भरोसा पैदा कर सके। कहने की जरूरत नहीं कि भाजपा नेतृत्व कर्नाटक के तजुर्बे से कोई सबक सीखने की समझदारी दिखाने को तैयार नहीं है।

Monday, October 3, 2011

एक अच्छा सुझाव उर्फ शिगूफा!


बीते दिनों केंद्र सरकार के समक्ष उत्पन्न राजनीतिक संकट का केंद्र बने और 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में अपनी कथित भूमिका को लेकर विपक्ष के निशाने पर आए केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम की ख्याति लोक-लुभावन बजट पेश करने वाले वित्त मंत्री के रूप में रही है। अलग-अलग अवधि में, अलग-अलग सरकारों के दौरान वित्त मंत्रालय में रहते हुए उन्होंने स्वप्निल बजट पेश करने वाले वित्त मंत्री के रूप में ऐसी छवि बनाई है कि हर तबका उन्हें अपना हितैषी मानता रहा है। अलबत्ता व्यावहारिक तौर पर उनके बनाए बजटों ने आम आदमी की आर्थिक दुश्वारियां ही बढ़ाई हैं, बेरोजगारों की तादाद में इजाफा ही किया है और देश में अमीरी-गरीबी के बीच की खाई को भी और ज्यादा गहरा किया है।
चिदंबरम इस समय भले ही गृह मंत्रालय का कामकाज देख रहे हों, लेकिन उनकी पहली पसंद वित्त मंत्रालय ही रहा है। फिलहाल व्यावहारिक तौर पर जरूर वे नॉर्थ ब्लाक के बाएं छोर पर बैठते हैं लेकिन उनका दिल-दिमाग नॉर्थ ब्लाक के दाहिने छोर पर स्थित वित्त मंत्रालय में चलने वाली गतिविधियों पर ही लगा रहता है। यही वजह है कि वे आर्थिक मसलों पर अपनी राय जाहिर करने का कोई मौका नहीं गंवाते हैं। फिलहाल चिदंबरम ने अमीर लोगों पर ज्यादा कर लगाने का सुझाव दिया है। उन्होंने यह सुझाव अखिल भारतीय प्रबंधन संघ (आइमा) के सालाना जलसे में दिया है। उनका यह सुझाव चौंकाने वाला है, क्योंकि करों का मामला वित्त मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है और बेतहाशा बढ़ती महंगाई के कारण सरकार और वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी पहले से ही विपक्ष के निशाने पर हैं और जनता में बेहद असंतोष है।
चिदंबरम के मुताबिक बारहवीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टिकोण पत्र के अनुसार देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.4 फीसदी से बढ़कर अगले वित्त वर्ष में 8.9 फीसदी हो जाएगी, मगर इसके साथ ही खर्च और कर्ज भी बढ़ जाएगा। खर्च और आमदनी के अंतर को पाटने के लिए खर्च को कम करना होगा और आमदनी बढ़ाने के नए उपाय खोजने होंगे। इसी सिलसिले में उन्होंने अमीरों पर ज्यादा कर लगाने का सुझाव दिया है। वैसे चिदंबरम का यह सुझाव कोई अनोखा नहीं है। अमेरिका सहित कई यूरोपीय देश भी अपने यहां आर्थिक मंदी से निबटने के लिए अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने का इरादा जाहिर कर चुके हैं।
फ्रांस में सबसे पहले यह सुझाव पिछले दिनों लिलियन बेटनकोर्ट नामक एक महिला उद्यमी ने और अमेरिका में वारेन बफेट ने दिया। लिलियन को यूरोप की सबसे धनी महिला माना जाता है और वारेन बफेट भी दुनिया के चुनिंदा बड़े अमीरों में शुमार किए जाते हैं। कुछ दिनों पहले बफेट ने न्यूयॉर्क टाइम्स में एक लेख लिखकर राष्ट्रपति बराक ओबामा को सलाह दी कि वे अमेरिका को मौजूदा आर्थिक संकट से उबारने और सरकार के खाली खजाने को भरने के लिए सुपर रिच यानी बड़े अमीरों से ज्यादा टैक्स वसूल करें। लिलियन ने भी आर्थिक संकट से जूझ रहे यूरोपीय देशों को ऐसा ही करने को कहा। उनके इस सुझाव से यूरोपीय देशों के अमीरों ने भी सहमति जताई है और वे भी अपनी सरकारों से कह रहे हैं कि कृपया हम पर ज्यादा टैक्स लगाओ। अमेरिका तथा यूरोपीय देशों में आमतौर पर यह व्यवस्था है कि जो व्यक्ति जितना अधिक कर चुकाता है, उसे सरकार उसी अनुपात में दूसरी कई तरह की सुविधाएं भी देती है। इसीलिए इन देशों के अमीर अपने ऊपर ज्यादा टैक्स लगाने का आग्रह कर रहे हैं।
अमेरिका और यूरोप में तो अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने की बात मंदी की आहट के चलते अब उठी है। हमारे देश में तो इस तरह सुझाव बहुत पहले साठ के दशक में ही पेश किया जा चुका है। उस समय आर्थिक उदारीकरण का तो कहीं अता-पता ही नहीं था और देश ने मिश्रित अर्थव्यवस्था अपना रखी थी, जिसे उस समय की सरकार समाजवादी अर्थव्यवस्था के रूप में प्रचारित करती थी। उस दौर में समाजवादी विचारक डॉ राममनोहर लोहिया ने लोकसभा में 'तीन आने बनाम पंद्रह आने' वाले अपने बहुचर्चित भाषण में खर्च की सीमा तय करने के साथ ही अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने का सुझाव दिया था।उनका कहना था कि अमीरी के पर्वत को काट कर ही गरीबी की खाई को पाटा जा सकता है और सामाजिक विषमता को भी मिटाया जा सकता है।
चिदंबरम के बारे में यह तो नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने अमीरों पर ज्यादा कर लगाने का सुझाव लोहिया से प्रभावित होकर दिया होगा। क्योंकि चिदंबरम की राजनीति जिस वातावरण में परवान चढ़ी है और उनके जो राजनीतिक सरोकार रहे हैं उनको देखते हुए कोई नहीं कह सकता कि वे लोहिया से प्रभावित हुए होंगे या उन्होंने लोहिया को पढ़ा होगा। जाहिर है उन्हें इस सुझाव की प्रेरणा बराक ओबामा, वॉरेन बफेट या लिलियन बेटनकोर्ट से से ही मिली होगी। यह भी तय है कि ओबामा, बफेट या लिलियन ने भी इस तरह का विचार लोहिया को पढ़कर या उनसे प्रभावित होकर नहीं दिया है। ऐसा हो भी नहीं सकता, क्योंकि लोहिया ने यह सुझाव देश और दुनिया में व्याप्त आर्थिक-सामाजिक गैर बराबरी को दूर करने के मकसद से दिया था। जबकि ओबामा, बफेट और लिलियन यह सुझाव सरकारों के खाली होते खजाने को भरने के लिए दे रहे हैं। चिदंबरम की चिंता के केंद्र में अमीरी-गरीबी के बीच की गहरी होती खाई नहीं है। वे भी अमीरों पर ज्यादा कर लगाने की पैरवी सरकारी खजाने को भरने के लिए कर रहे हैं।
बहरहाल, चिदंबरम का यह सुझाव इसलिए भी चौंकाता है कि वे समाजवादी अर्थव्यवस्था के नहीं बल्कि उदारीकरण के ही पैरोकार माने जाते हैं और वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने ही करों की दरें कम कर धनी वर्ग को राहत पहुंचाई थी। अब चूंकि खजाने की चाबी उनके पास नहीं हैं, यानी वे वित्त मंत्री नहीं हैं और उनके पास गृह मंत्री के नाते देश की चौकीदारी का जिम्मा है, इसलिए शक होता है कि अमीरों पर ज्यादा कर लगाने का उनका सुझाव कोई शिगूफा तो नहीं है! अपने इस सुझाव को लेकर वे कितने गंभीर हैं यह तो पता नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि यह सुझाव उदारीकरण से कतई मेल नहीं खाता है। इसलिए लगता नहीं है कि उनके इस सुझाव को देश में उदारीकरण के प्रवर्तक और परम उपासक माने जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और विश्व बैंक तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की धुन पर नृत्य करने वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया जैसे उनके सलाहकार परवान चढ़ने देंगे।
देश में इस समय आयकर चुकाने वालों की संख्या चार फीसदी से भी कम है। यानी लगभग सवा अरब की आबादी वाले देश में पांच करोड़ से भी कम लोग आयकर चुकाते हैं। जबकि सरकार आए दिन देश की अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर पेश करते हुए दावे करती है कि देश तेजी से आर्थिक विकास कर रहा है। सरकार जब यह दावा करती है तो उसका आशय देश के बड़े शहरों में खुलते शॉपिंग मॉल, सड़कों पर चमचमाती कारों की संख्या में इजाफे, उपभोक्ता वस्तओं बढ़ती खपत और शेयर बाजार के बढ़ते सूचकांक से होता है। सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्यूफेक्चरर्स द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक देश में प्रतिदिन लगभग पांच हजार कारें शो रूम से निकलकर सड़कों पर आ रही हैं। वर्ष 2009 में 14 लाख 30 हजार कारों की बिक्री हुई थीं। इस आंकड़े में वर्ष 2010 में सीधे 31 फीसदी का इजाफा हुआ यानी इस वर्ष लगभग 18 लाख 70 हजार कारें शो रूम से निकलकर सड़कों पर दौड़ने लगीं। जाहिर है कि देश में आयकर के दायरे में आने वालों की तादाद पांच करोड़ लोगों से ज्यादा है, जबकि आयकर पांच करोड़ से भी कम लोग चुकाते हैं। यानी ब़ड़े पैमाने पर आयकर की चोरी होती है। ऐसे में सरकार अगर अपने टैक्स वसूलने वाले तंत्र को ही चुस्त-दुस्र्स्त कर ले तो उसके राजस्व में काफी बढ़ोतरी हो सकती है।
 राजस्व बढ़ाने का एक तरीका यह भी है कि सरकार लोगों के खर्च की सीमा तय करे और सीमा से अधिक किए जाने वाले खर्च पर कर का निर्धारण करे। सरकार अगर चिदंबरम के सुझाव को मानकर वास्तव में अमीरों पर करों बोझ बढ़ाती है तो ऐसे में सवाल उठता है कि ऐसा करने के लिए वह किन लोगों को अमीर मानेगी। सरकार के सबसे बड़े मार्गदर्शक माने जाने वाले योजना आयोग ने गरीबी की परिभाषा तो तय कर दी है। उसके मुताबिक शहरों में 32 स्र्पए और गांवों में 26 स्र्पए रोज में जीवन-यापन करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं माना जाएगा। गरीबी मापने के इस हास्यास्पद पैमाने का व्यापक स्तर पर विरोध हो रहा है। इसी तरह जब सरकार अमीरों पर टैक्स की दरें बढ़ाते वक्त अमीरी का जो पैमाना बनाएगी, वह भी निश्चित ही विवादों से परे नहीं होगा। बहरहाल, सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि महंगाई और भ्रष्टाचार के कारण देश के गरीब और मध्यम वर्ग नाराजगी की नाराजगी झेल रही सरकार क्या देश के खाए-अघाए यानी सम्पन्न तबके को भी नाराज करने वाला कदम उठाने का साहस जुटा सकती है?