Tuesday, October 25, 2011

दीपावली की सामाजिकता को चट करता बाजार

 दीपावली का पर्व अमावस्या को मनाया  जाता है और इस दिन दीये जलाए जाते हैं, इससे यह प्रतीक बेहद लोकप्रिय हो गया है कि यह अंधकार पर प्रकाश की और असत्य पर सत्य की विजय का पर्व है। इस प्रतीकवाद की पुष्टि के लिए ही संस्कृत की उक्ति 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' पेश की जाती है। यह एक ऐसा प्रतीकवाद है, जो आधुनिक भारतीय चित्त को बहुत भाता है, क्योंकि इससे उसका राष्ट्रीय और सामाजिक गौरव बढ़ता है। ज्यादा सच तो यह प्रतीत होता है कि चौदह वर्ष के वनवास की अवधि समाप्त कर और रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद राम के अयोध्या लौटने पर दीपावली मनाने की परंपरा शुरू हुई। इस लिहाज से यह सुशासन कायम होने का उत्सव है। भारत में सुशासन की कल्पना राम-राज्य से जुड़ी रही है। लेकिन हमारे देश ने इतने लंबे समय तक सुशासन ही नहीं, शासन का भी ऐसा नितांत अभाव देखा है कि राम-राज्य की कसक उसके अंतर्मन में बैठ गई है। आम देशवासियों के इस स्वप्न को जिस व्यक्ति ने पुनर्जाग्रत किया, उसका नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। आजादी के बाद देश की जनता को महात्मा गांधी की कल्पना के अनुरूप राम-राज्य नहीं मिला। उसे जो मिला था, वह शुध्द कांग्रेस राज था। लंबे समय तक चले और आज भी जारी इस कांग्रेसी राज के बीच-बीच में थोड़े समय के लिए तथाकथित जनता राज (जनता पार्टी का शासन) भी आया और फिर तथाकथित रामभक्तों (भाजपा-एनडीए) का राज भी आया लेकिन देश का सुशासन से परिचय नहीं हो सका तो नहीं हो सका। उसे मिला तो सिर्फ घपले-घोटालों और भाई-भतीजावाद का राज, जो आज अपने भयावह रूप में सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, विभिन्न राज्यों में भी जारी है। घोटालों का जो घटाटोप देश पर छाया हुआ है उसके खत्म होने के आसार कहीं से भी नजर नहीं आ रहे हैं। 
वैसे दीपावली खास तौर पर लक्ष्मी की पूजा-आराधना का पर्व है। लक्ष्मी यानी धन-धान्य और ऐश्वर्य की देवी। इस आधार पर हमारा भारत जितना आध्यात्मिक है उतना ही भौतिकवादी देश भी है। हम ज्ञान के साथ-साथ ही समृद्धि की भी उपासना करते आए हैं, क्योंकि हमें परलोक को ही नहीं, इस लोक को भी सुंदर और सफल बनाना है। लक्ष्मी भगवान विष्णु की पत्नी हैं। हमारे धर्म-शास्त्रों में विष्णु को इस सृष्टि का सूत्रधार माना गया है। वही सृष्टि का संचालन और पालन-पोषण करते हैं। जाहिर है कि इस दायित्व का निर्वाह वह अकेले नहीं कर सकते। इसमें उन्हें अपनी पत्नी लक्ष्मी का सहयोग चाहिए। इन पौराणिक प्रतीकों के माध्यम से हमारे शास्त्र-रचयिता ऋषियों-मनीषियों ने संभवतः यह संदेश देना चाहा हो कि हमें धन की उपासना तो अवश्य करनी चाहिए लेकिन वह उपासना इस तरह हो, जैसे पूजा की जा रही हो। अर्थात्‌ भौतिकता के साथ पवित्रता का भाव भी जुड़ा हुआ हो। अनैतिक साधनों से अर्जित किया गया धन जीवन में अभिशाप ही पैदा करता है। इसकी पुष्टि हमारे देश के मौजूदा हालात देखकर भी होती है। देश ने विदेशी दासता से स्वतंत्र होते ही धन की उपासना शुरू कर दी थी। देशी शासकों ने देशवासियों को सुखी और समृद्ध बनाने के लिए तरह-तरह के यत्न शुरू किए। पंचवर्षीय योजनाएं बनाई जाने लगी। स्पष्ट तौर पर यह उपासना समाजवादी संपन्नता की थी। लेकिन चूंकि इसके लिए अपनाए गए तौर-तरीके कतई समाजवादी नहीं थे, इसलिए गरीबी के विशाल हिन्द महासागर में समृद्धि के कुछ टापू ही उभर पाए। वर्ष 1991 में विदेशी मुद्रा भंडार के खाली हो जाने से उपजे संकट ने हमारी अर्थव्यवस्था की दिशा ही बदल दी। तब के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव और वित्त मंत्री (मौजूदा प्रधानमंत्री) डॉ मनमोहन सिंह की जोड़ी ने उदारीकरण यानी बाजारोन्मुख अर्थव्यवस्था का रास्ता अपनाया, जो कि पूंजीवाद का ही नया संस्करण है। तब से लेकर आज तक हम एकाग्रभाव से बाजारवाद की ही पूजा-अर्चना कर रहे हैं। लक्ष्मी अब लोक की देवी नहीं, बल्कि ग्लोबल प्रतिमा बन गई हैं। उसकी पूजा में अब लोक-जीवन को संपन्न बनाने की इच्छा कम और खुद को समृद्ध बनाने की लालसा ज्यादा व्यक्त की जाती है। डिजायनों और ब्रांडों के बोलबाले ने मिट्टी की लक्ष्मी प्रतिमाओं और कुम्हार के कलाकार हाथों से ढले दीयों को भी डिजायनर बना दिया है। डिजायनर दीयों के साथ ही ब्रांडेड मोमबत्तियां और मोम के दीयों का भी चलन बढ़ गया है। पारंपरिक मिठाइयों की जगह अब ब्रांडेड मिठाइयों और चॉकलेटों ने ले ली है। दीपावली पर उपहारों और मिठाइयों के आदान-प्रदान का चलन पुराना है लेकिन पहले उनमें आत्मीयता होती थी। अब जिन महंगे उपहारों या मिठाइयों का लेन-देन होता है उनमें से आत्मीयता और मिठास का पूरी तरह लोप हो गया है और उनकी जगह ले ली है दिखावे और स्वार्थ ने। यानी अब राजनीति के साथ-साथ हमारी संस्कृति और सामाजिकता भी बाजार के रंग में रंग गई है। दीपावली समेत हमारी लोक-संस्कृति से जुड़े तमाम त्योहारों, पर्वो और यहां तक कि महिलाओं द्वारा किए जाने वाले करवा चौथ और हरतालिका तीज जैसे व्रतों को भुनाने में भी बाजार अब पीछे नहीं रहता हैं। 
निस्संदेह बाजारवाद से देश में समृद्धि का एक नया वातावरण निर्मित हुआ है। महानगरों में एक बड़े वर्ग के बीच हमेशा उत्सव का माहौल रहता है। लेकिन उनके इस उत्सव में न तो बहुत ज्यादा सामाजिकता होती है और न ही इसके पीछे किसी प्रकार की कलात्मकता। उसमें जो कुछ होता है, उसे भोग-विलास या आमोद-प्रमोद का फूहड़ और बेकाबू वातावरण ही कह सकते हैं। यह सब कुछ अगर एक छोटे से तबके तक ही सीमित रहता तो, कोई खास हर्ज नहीं था। लेकिन मुश्किल तो यह है कि 'यथा राजा-तथा प्रजा' की तर्ज पर ये ही मूल्य हमारे राष्ट्रीय जीवन पर हावी हो रहे हैं। जो लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं या जिनकी आमदनी सीमित है, उनके लिए बैंकों ने 'ऋणं कृत्वा, घृतम्‌ पीवेत' की तर्ज पर क्रेडिट कार्डों और कर्ज के जाल बिछा कर अपने खजाने खोल रखे हैं। लोग इन महंगी ब्याज दरों वाले कर्ज और क्रेडिट कार्डों की मदद से सुख-सुविधा के आधुनिक साधन खरीद रहे हैं। विभिन्न कंपनियों के शोरूमों से निकलकर रोजाना सड़कों पर आ रहीं लगभग पांच हजार कारों और शान-ओ शौकत की तमाम वस्तुओं की दुकानों और शॉपिंग मॉल्स पर लगने वाली भीड़ देखकर भी स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। कुल मिलाकर हर तरफ लालसा का तांडव ही ज्यादा दिखाई पड़ रहा है। तृप्त हो चुकी लालसा से अतृप्त लालसा ज्यादा खतरनाक होती है। देशभर में बढ़ रहे अपराधों-खासकर यौन अपराधों की वजह यही है। यह अकारण नहीं है कि देश के उन्हीं इलाकों में अपराधों का ग्राफ सबसे नीचे है, जिन्हें बाजारवाद ज्यादा स्पर्श नहीं कर पाया है। यह सब कहने का आशय विपन्नता का महिमा-मंडन करना कतई नहीं है, बल्कि यह अनैतिक समृद्धि की रचनात्मक आलोचना है। ऐसी आलोचना नहीं होनी चाहिए क्या?  

Sunday, October 23, 2011

येदियुरप्पा उर्फ भाजपा की कलंक कथा

प्रधानमंत्री  बनने की अपनी चिर-परिचित हसरत के साथ भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस और उसके नेतृत्व  वाली केंद्र की यूपीए सरकार  की घेराबंदी करने के लिए एक बार फिर देशव्यापी रथयात्रा पर निकले भारतीय जनता पार्टी के महारथी लालकृष्ण आडवाणी और उनके सहयोगियों को अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि उनकी नैतिकता का रथ इतनी जल्दी अपने ही घर में फैले भ्रष्टाचार के दलदल में फंस जाएगा। मध्य प्रदेश के सतना शहर में आडवाणी की रथयात्रा के सिलसिले में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज्य सरकार के एक मंत्री समेत भाजपा नेताओं द्वारा पत्रकारों को पैसे बांटने का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि भ्रष्टाचार के आरोपों में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को जेल जाना पड़ गया। उनके जेल जाने से आडवाणी और पार्टी के दूसरे बड़े नेता ही नहीं, समूचा संघ परिवार सकते में हैं। कहां तो वे कांग्रेस को घेरने निकले थे और कहां अब उनकी ही पार्टी के एक क्षत्रप की कारगुजारी ने उन्हें आईना देखने पर मजबूर कर दिया है।
कोई साढ़े तीन साल पहले जब कर्नाटक  में भाजपा सत्ता में  आई थी तो यह किसी भी अन्य राज्य  की तुलना में उसके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। दक्षिण भारत में अपनी सरकार बनाने की उसकी हसरत परवान चढ़ी थी। लेकिन सत्ता में आने के बाद जो कुछ हुआ वह सत्ता के दुस्र्पयोग और भ्रष्टाचार की हैरतअंगेज दास्तान है। अवैध खनन के बारे में ढाई महीने पहले राज्य के तत्कालीन लोकायुक्त संतोष हेगड़े की रिपोर्ट आने के बाद येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था और अब भूमि घोटाले में उनकी लिप्तता के आरोप ने उन्हें जेल के सींखचों के पीछे पहुंचा दिया है। दक्षिण भारत में अपने बूते भाजपा को पहली बार सत्ता का आस्वादन कराने वाले कद्दावर नायक से खलनायक बने येदियुरप्पा कर्नाटक के पहले और देश के ऐसे पांचवें पूर्व मुख्यमंत्री हो गए जिन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते बेआबरू होकर सींखचों के पीछे जाना पड़ा। इसके पहले महाराष्ट्र के अब्दुल रहमान अंतुले, तमिलनाडु की जयललिता, बिहार के लालू प्रसाद यादव और झारखंड के मधु कोड़ा इसी तरह के आरोपों के चलते जेल की हवा खा चुके हैं।
कांग्रेस  और पूर्व  प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के जनता दल (सेक्यूलर) के कुशासन से त्रस्त कर्नाटक  की जनता से सुशासन देने का वादा कर सत्ता में आए येदियुरप्पा  बहुत जल्द अपने भ्रष्टाचरण की गाथा लिखने में मशगूल हो गए थे। उन्होंने बेखौफ होकर अपने परिजनों, रिश्तेदारों और मित्रों को बेशकीमती सरकारी जमीन कौड़ियों के भाव दे दी, विधानसभा में बहुमत बनाए रखने के लिए निर्दलीय और विपक्षी विधायकों की खरीद-फरोख्त की और पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के दुलारे बेल्लारी के बदनाम रेड्डी भाइयों को राज्य की बेशकीमती खदानों का मालिक बना दिया। इस सबकी तार्किक परिणति हुई मुख्यमंत्री पद से उनकी स्र्खसती में। वैसे यह तथ्य बहुत पहले ही जगजाहिर हो चुका था कि मुख्यमंत्री पद का दुस्र्पयोग करते हुए येदियुरप्पा ने अपने परिजनों और चहेतों को उपकृत किया है। अगर तभी भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उनसे पिंड छुड़ा लेता तो आज पार्टी की ऐसी भद नहीं पिटती। लेकिन जब तक बन पड़ा पार्टी उनका बचाव करती रही। पार्टी की ओर से कभी कर्नाटक के प्रभारी रहे वरिष्ठ नेता शांता कुमार के एक बयान से भी इसकी तसदीक होती है। तत्कालीन लोकायुक्त की रिपोर्ट आने के बाद मची सियासी उथल-पुथल के दौरान शांता कुमार ने कहा था कि उन्होंने इस बारे में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को पहले ही आगाह कर दिया था। लेकिन पार्टी सब कुछ जानते हुए भी मूकदर्शक बनी रही, जब तक कि येदियुरप्पा पार्टी के गले की फांस नहीं बन गए।
 येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री रहते हुए जो कुछ धतकरम किए उसमें उन्होंने तो किसी तरह का शर्म-संकोच नहीं ही किया, लेकिन उनके सारे किए-धरे को नजरअंदाज करने में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने भी कम निर्लज्जता नहीं दिखाई। जमीन आवंटन से संबंधित मामले में जब येदियुरप्पा पर आरोप लगे थे तब भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने तो यह कहते हुए निहायत बेशर्मी के साथ उनका बचाव किया था कि येदियुरप्पा ने जो किया है, वह अनैतिक तो है पर गैरकानूनी नहीं। जाहिर है कि भाजपा येदियुरप्पा को छेड़ने में हिचकिचा रही थी। उसे डर था कि ऐसा करने से येदियुरप्पा के वफादार विधायक बगावत पर उतर आएंगे। भाजपा अक्सर दूसरे दलों पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाती रहती है मगर कर्नाटक के प्रभावशाली लिंगायत समुदाय का समर्थन खो देने के डर से वह येदियुरप्पा के साथ नरमी बरतती रही। पार्टी नेतृत्व को लग रहा था कि येदियुरप्पा के वफादार विधायकों की बगावत से दक्षिण भारत में बड़ी मुश्किल से बनी पार्टी की पहली सरकार बेमौत मारी जाएगी और लिंगायत समुदाय के पार्टी से दूर हो जाने  पर भविष्य में दोबारा वहां सत्ता में लौटना मुश्किल हो जाएगा।
 पाकिस्तान में मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ में एक वस्तुपरक बयान देने पर आडवाणी को भाजपा का अध्यक्ष पद छोड़ देने पर मजबूर कर देने वाले संघ नेतृत्व ने भी येदियुरप्पा के भ्रष्ट कारनामों को पूरी तरह नजरअंदाज किया। संघ अपने को चरित्र निर्माण की पाठशाला कहता रहता है लेकिन उसके निष्ठावान स्वयंसेवक येदियुरप्पा पर लगे आरोप और उनकी गिरफ्तारी बताती है कि संघ अपने स्वयंसेवकों का किस तरह का चरित्र निर्माण करता है। लोकायुक्त की अदालत ने येदियुरप्पा की गिरफ्तारी का आदेश ऐसे वक्त जारी किया, जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा केंद्र सरकार और कांग्रेस को घेरने में जी-जान से जुटी हुई है। लालकृष्ण आडवाणी तो जनचेतना रथ पर सवार होकर कांग्रेस और केंद्र सरकार पर हमले बोल ही रहे हैं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी अण्णा हजारे के आंदोलन का श्रेय लूटने में पीछे नहीं है।
येदियुुरप्पा  की गिरफ्तारी ने सुराज  और सुशासन का मंत्रोच्चार करने वाले रथयात्री आडवाणी के लिए बेहद असहज स्थिति पैदा कर दी है। यह अकारण नहीं हैं कि प्रतिदिन अपनी यात्रा प्रारंभ करने से पूर्व संवाददाताओं से बतियाने वाले आडवाणी को येदियुरप्पा की गिरफ्तारी के अगले दिन भोपाल पहुंचने पर अपना गला खराब होने आड़ लेते हुए प्रेस कांफ्रेंस रद्द करनी पड़ी। लेकिन अगले दिन नागपुर में उन्हें हिम्मत जुटा कर कहना पड़ा कि येदियुरप्पा को पार्टी ने पहले ही सचेत किया था, लेकिन वे नहीं चेते और उनकी कारगुजारियों के लिए पार्टी को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है। यह विडंबना ही है कि आडवाणी की इस साफगोई से पार्टी के दूसरे नेता अपने को असहज महसूस कर रहे हैं। वे अभी भी येदियुरप्पा के प्रति अपना मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं। पार्टी महासचिव और प्रवक्ता जेपी नड्डा ने साफ कहा है उनकी गिरफ्तारी महज एक कानूनी मसला है, इसलिए कानून अपना काम करेगा लेकिन पार्टी पूरी तरह येदियुरप्पा के साथ है। इतना ही नहीं, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा सहित राज्य सरकार के तमाम मंत्री येदियुरप्पा के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। वैसे इसमें अचरज की कोई बात नहीं है। भ्रष्टाचार के खिलाफ बने देशव्यापी माहौल में कांग्रेस के खिलाफ सियासी बढ़त हासिल करने के लिए येदियुरप्पा भले ही हटा दिए गए लेकिन सदानंद गौड़ा को उनकी मर्जी से ही उनका उत्तराधिकारी बनाना गया। जो पार्टी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में फंसे अपने एक नेता की पसंद-नापसंद का इतना ध्यान रखती हो, वह किस नैतिक धरातल पर खड़ी होकर भ्रष्टाचार से लड़ने का दावा कर सकती है?
 देश अभी भूला नहीं है कि अवैध खनन में भागीदारी और सरकारी जमीन की हेराफेरी के सिलसिले में येदियुरप्पा को लोकायुक्त की रिपोर्ट में साफ तौर पर दोषी करार दे दिए जाने के बाद पार्टी नेतृत्व ने जब मजबूर होकर येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटने का फरमान जारी किया था तो येदियुरप्पा ने किस तरह लिंगायत समुदाय में अपनी पैठ को अपने राजनीतिक सुरक्षा कवच की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश करते हुए पार्टी नेतृत्व को बागी तेवर दिखाए थे और फिर मजबूरन इस्तीफा देने के बाद अपने 'विश्वस्त' को मुख्यमंत्री बनवाकर सत्ता में अपनी वापसी का रास्ता खुला रखना चाहा था। लेकिन अदालत के आदेश पर हुई उनकी गिरफ्तारी ने उनके इस मंसूबे पर पानी फेर दिया है। मुख्यमंत्री पद से जेल तक येदियुरप्पा का यह सफरनामा भाजपा के लिए निश्चित तौर पर एक बड़ा झटका तो है ही, एक सबक भी है। सबक यह कि भ्रष्टाचार के मसले पर दूसरों पर पत्थर उछालने के पहले अपने घर को दुस्र्स्त करना होगा। येदियुरप्पा प्रकरण ने मुख्यमंत्रियों के विवेकाधिकारों के औचित्य पर भी सवाल खड़े किए हैं लेकिन भाजपा ने अभी तक इस बारे में ऐसा कोई नीतिगत फैसला नहीं किया है और न ही करने का इरादा जताया है जो मुख्यमंत्रियों के विवेकाधीन कोटे के दुस्र्पयोग पर अंकुश लगने का भरोसा पैदा कर सके। कहने की जरूरत नहीं कि भाजपा नेतृत्व कर्नाटक के तजुर्बे से कोई सबक सीखने की समझदारी दिखाने को तैयार नहीं है।

Monday, October 3, 2011

एक अच्छा सुझाव उर्फ शिगूफा!


बीते दिनों केंद्र सरकार के समक्ष उत्पन्न राजनीतिक संकट का केंद्र बने और 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में अपनी कथित भूमिका को लेकर विपक्ष के निशाने पर आए केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम की ख्याति लोक-लुभावन बजट पेश करने वाले वित्त मंत्री के रूप में रही है। अलग-अलग अवधि में, अलग-अलग सरकारों के दौरान वित्त मंत्रालय में रहते हुए उन्होंने स्वप्निल बजट पेश करने वाले वित्त मंत्री के रूप में ऐसी छवि बनाई है कि हर तबका उन्हें अपना हितैषी मानता रहा है। अलबत्ता व्यावहारिक तौर पर उनके बनाए बजटों ने आम आदमी की आर्थिक दुश्वारियां ही बढ़ाई हैं, बेरोजगारों की तादाद में इजाफा ही किया है और देश में अमीरी-गरीबी के बीच की खाई को भी और ज्यादा गहरा किया है।
चिदंबरम इस समय भले ही गृह मंत्रालय का कामकाज देख रहे हों, लेकिन उनकी पहली पसंद वित्त मंत्रालय ही रहा है। फिलहाल व्यावहारिक तौर पर जरूर वे नॉर्थ ब्लाक के बाएं छोर पर बैठते हैं लेकिन उनका दिल-दिमाग नॉर्थ ब्लाक के दाहिने छोर पर स्थित वित्त मंत्रालय में चलने वाली गतिविधियों पर ही लगा रहता है। यही वजह है कि वे आर्थिक मसलों पर अपनी राय जाहिर करने का कोई मौका नहीं गंवाते हैं। फिलहाल चिदंबरम ने अमीर लोगों पर ज्यादा कर लगाने का सुझाव दिया है। उन्होंने यह सुझाव अखिल भारतीय प्रबंधन संघ (आइमा) के सालाना जलसे में दिया है। उनका यह सुझाव चौंकाने वाला है, क्योंकि करों का मामला वित्त मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है और बेतहाशा बढ़ती महंगाई के कारण सरकार और वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी पहले से ही विपक्ष के निशाने पर हैं और जनता में बेहद असंतोष है।
चिदंबरम के मुताबिक बारहवीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टिकोण पत्र के अनुसार देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.4 फीसदी से बढ़कर अगले वित्त वर्ष में 8.9 फीसदी हो जाएगी, मगर इसके साथ ही खर्च और कर्ज भी बढ़ जाएगा। खर्च और आमदनी के अंतर को पाटने के लिए खर्च को कम करना होगा और आमदनी बढ़ाने के नए उपाय खोजने होंगे। इसी सिलसिले में उन्होंने अमीरों पर ज्यादा कर लगाने का सुझाव दिया है। वैसे चिदंबरम का यह सुझाव कोई अनोखा नहीं है। अमेरिका सहित कई यूरोपीय देश भी अपने यहां आर्थिक मंदी से निबटने के लिए अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने का इरादा जाहिर कर चुके हैं।
फ्रांस में सबसे पहले यह सुझाव पिछले दिनों लिलियन बेटनकोर्ट नामक एक महिला उद्यमी ने और अमेरिका में वारेन बफेट ने दिया। लिलियन को यूरोप की सबसे धनी महिला माना जाता है और वारेन बफेट भी दुनिया के चुनिंदा बड़े अमीरों में शुमार किए जाते हैं। कुछ दिनों पहले बफेट ने न्यूयॉर्क टाइम्स में एक लेख लिखकर राष्ट्रपति बराक ओबामा को सलाह दी कि वे अमेरिका को मौजूदा आर्थिक संकट से उबारने और सरकार के खाली खजाने को भरने के लिए सुपर रिच यानी बड़े अमीरों से ज्यादा टैक्स वसूल करें। लिलियन ने भी आर्थिक संकट से जूझ रहे यूरोपीय देशों को ऐसा ही करने को कहा। उनके इस सुझाव से यूरोपीय देशों के अमीरों ने भी सहमति जताई है और वे भी अपनी सरकारों से कह रहे हैं कि कृपया हम पर ज्यादा टैक्स लगाओ। अमेरिका तथा यूरोपीय देशों में आमतौर पर यह व्यवस्था है कि जो व्यक्ति जितना अधिक कर चुकाता है, उसे सरकार उसी अनुपात में दूसरी कई तरह की सुविधाएं भी देती है। इसीलिए इन देशों के अमीर अपने ऊपर ज्यादा टैक्स लगाने का आग्रह कर रहे हैं।
अमेरिका और यूरोप में तो अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने की बात मंदी की आहट के चलते अब उठी है। हमारे देश में तो इस तरह सुझाव बहुत पहले साठ के दशक में ही पेश किया जा चुका है। उस समय आर्थिक उदारीकरण का तो कहीं अता-पता ही नहीं था और देश ने मिश्रित अर्थव्यवस्था अपना रखी थी, जिसे उस समय की सरकार समाजवादी अर्थव्यवस्था के रूप में प्रचारित करती थी। उस दौर में समाजवादी विचारक डॉ राममनोहर लोहिया ने लोकसभा में 'तीन आने बनाम पंद्रह आने' वाले अपने बहुचर्चित भाषण में खर्च की सीमा तय करने के साथ ही अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने का सुझाव दिया था।उनका कहना था कि अमीरी के पर्वत को काट कर ही गरीबी की खाई को पाटा जा सकता है और सामाजिक विषमता को भी मिटाया जा सकता है।
चिदंबरम के बारे में यह तो नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने अमीरों पर ज्यादा कर लगाने का सुझाव लोहिया से प्रभावित होकर दिया होगा। क्योंकि चिदंबरम की राजनीति जिस वातावरण में परवान चढ़ी है और उनके जो राजनीतिक सरोकार रहे हैं उनको देखते हुए कोई नहीं कह सकता कि वे लोहिया से प्रभावित हुए होंगे या उन्होंने लोहिया को पढ़ा होगा। जाहिर है उन्हें इस सुझाव की प्रेरणा बराक ओबामा, वॉरेन बफेट या लिलियन बेटनकोर्ट से से ही मिली होगी। यह भी तय है कि ओबामा, बफेट या लिलियन ने भी इस तरह का विचार लोहिया को पढ़कर या उनसे प्रभावित होकर नहीं दिया है। ऐसा हो भी नहीं सकता, क्योंकि लोहिया ने यह सुझाव देश और दुनिया में व्याप्त आर्थिक-सामाजिक गैर बराबरी को दूर करने के मकसद से दिया था। जबकि ओबामा, बफेट और लिलियन यह सुझाव सरकारों के खाली होते खजाने को भरने के लिए दे रहे हैं। चिदंबरम की चिंता के केंद्र में अमीरी-गरीबी के बीच की गहरी होती खाई नहीं है। वे भी अमीरों पर ज्यादा कर लगाने की पैरवी सरकारी खजाने को भरने के लिए कर रहे हैं।
बहरहाल, चिदंबरम का यह सुझाव इसलिए भी चौंकाता है कि वे समाजवादी अर्थव्यवस्था के नहीं बल्कि उदारीकरण के ही पैरोकार माने जाते हैं और वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने ही करों की दरें कम कर धनी वर्ग को राहत पहुंचाई थी। अब चूंकि खजाने की चाबी उनके पास नहीं हैं, यानी वे वित्त मंत्री नहीं हैं और उनके पास गृह मंत्री के नाते देश की चौकीदारी का जिम्मा है, इसलिए शक होता है कि अमीरों पर ज्यादा कर लगाने का उनका सुझाव कोई शिगूफा तो नहीं है! अपने इस सुझाव को लेकर वे कितने गंभीर हैं यह तो पता नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि यह सुझाव उदारीकरण से कतई मेल नहीं खाता है। इसलिए लगता नहीं है कि उनके इस सुझाव को देश में उदारीकरण के प्रवर्तक और परम उपासक माने जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और विश्व बैंक तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की धुन पर नृत्य करने वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया जैसे उनके सलाहकार परवान चढ़ने देंगे।
देश में इस समय आयकर चुकाने वालों की संख्या चार फीसदी से भी कम है। यानी लगभग सवा अरब की आबादी वाले देश में पांच करोड़ से भी कम लोग आयकर चुकाते हैं। जबकि सरकार आए दिन देश की अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर पेश करते हुए दावे करती है कि देश तेजी से आर्थिक विकास कर रहा है। सरकार जब यह दावा करती है तो उसका आशय देश के बड़े शहरों में खुलते शॉपिंग मॉल, सड़कों पर चमचमाती कारों की संख्या में इजाफे, उपभोक्ता वस्तओं बढ़ती खपत और शेयर बाजार के बढ़ते सूचकांक से होता है। सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्यूफेक्चरर्स द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक देश में प्रतिदिन लगभग पांच हजार कारें शो रूम से निकलकर सड़कों पर आ रही हैं। वर्ष 2009 में 14 लाख 30 हजार कारों की बिक्री हुई थीं। इस आंकड़े में वर्ष 2010 में सीधे 31 फीसदी का इजाफा हुआ यानी इस वर्ष लगभग 18 लाख 70 हजार कारें शो रूम से निकलकर सड़कों पर दौड़ने लगीं। जाहिर है कि देश में आयकर के दायरे में आने वालों की तादाद पांच करोड़ लोगों से ज्यादा है, जबकि आयकर पांच करोड़ से भी कम लोग चुकाते हैं। यानी ब़ड़े पैमाने पर आयकर की चोरी होती है। ऐसे में सरकार अगर अपने टैक्स वसूलने वाले तंत्र को ही चुस्त-दुस्र्स्त कर ले तो उसके राजस्व में काफी बढ़ोतरी हो सकती है।
 राजस्व बढ़ाने का एक तरीका यह भी है कि सरकार लोगों के खर्च की सीमा तय करे और सीमा से अधिक किए जाने वाले खर्च पर कर का निर्धारण करे। सरकार अगर चिदंबरम के सुझाव को मानकर वास्तव में अमीरों पर करों बोझ बढ़ाती है तो ऐसे में सवाल उठता है कि ऐसा करने के लिए वह किन लोगों को अमीर मानेगी। सरकार के सबसे बड़े मार्गदर्शक माने जाने वाले योजना आयोग ने गरीबी की परिभाषा तो तय कर दी है। उसके मुताबिक शहरों में 32 स्र्पए और गांवों में 26 स्र्पए रोज में जीवन-यापन करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं माना जाएगा। गरीबी मापने के इस हास्यास्पद पैमाने का व्यापक स्तर पर विरोध हो रहा है। इसी तरह जब सरकार अमीरों पर टैक्स की दरें बढ़ाते वक्त अमीरी का जो पैमाना बनाएगी, वह भी निश्चित ही विवादों से परे नहीं होगा। बहरहाल, सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि महंगाई और भ्रष्टाचार के कारण देश के गरीब और मध्यम वर्ग नाराजगी की नाराजगी झेल रही सरकार क्या देश के खाए-अघाए यानी सम्पन्न तबके को भी नाराज करने वाला कदम उठाने का साहस जुटा सकती है?



Wednesday, September 28, 2011

भारत में सोनार बांग्ला तलाशती तसलीमा


बांग्लादेश में इस वक्त शेख हसीना के नेतृत्व में एक लोकतांत्रिक और अपेक्षाकृत उदारवादी सरकार होने के बावजूद डेढ़ दशक से ज्यादा समय से निर्वासित जीवन जी रही तसलीमा नसरीन को नहीं लगता कि अपने वतन यानी बांग्लादेश लौट पाने की उनकी तमन्ना कभी पूरी हो सकेगी। अब उनकी ख्वाहिश कोलकाता में बसने की है, जिसे वह अपना दूसरा घर मानती हैं। फिलहाल भारत सरकार ने उन्हें अस्थायी तौर पर दिल्ली में रहने की इजाजत दे रखी है। ज्यादा उचित तो यह होता कि भारत सरकार तसलीमा के वीजा की अवधि को टुकड़ों-टुकड़ों में बढ़ाने के बजाय थोड़ी और हिम्मत दिखाते हुए उन्हें स्थायी नागरिकता प्रदान करने या उन्हें अपने यहां राजनीतिक शरण देने का फैसला करती, जिसके लिए कि उन्होंने कई वर्षों से आवेदन कर रखा है। यह तो तय है कि बांग्लादेश में शेख हसीना की जम्हूरी हुकूमत होते हुए भी वहां जिस तरह का माहौल है, तसलीमा के लिए अपने वतन लौटना काफी मुश्किलों भरा है। वहां उनकी सभी पुस्तकें प्रतिबंधित हैं और कई मुकदमे उनका इंतजार कर रहे हैं। हालांकि तसलीमा में इतनी क्षमता है कि वे इन मुकदमों का न्यायिक सामना कर सकें, लेकिन इसमें संदेह की पूरी गुंजाइश है कि मुकदमों की कार्यवाही शुद्ध न्यायिक आधार चल सकेगी। आखिर एक कट्टरपंथी समाज में अदालतें भी तो हवा का रूख भांपकर ही काम करती हैं। इससे भी ज्यादा तकलीफदेह आशंका यह है कि बांग्लादेश में तसलीमा का जीवन सुरक्षित रहेगा या नहीं। उनके कटे हुए सिर पर काफी बड़ी राशियों के इनाम घोषित हैं और इस्लाम के पंडे उन्हें संगसार करने पर आमादा हैं।
 तसलीमा को जब बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था, तब भी भारत सरकार ने कोई पहल नहीं की थी, अन्यथा वे तभी भारत आ जाती। उस वक्त उन्हें बांग्लादेश से निकलकर यूरोप में पनाह लेनी पड़ी थी। वहां के अनेक देशों ने उन्हें हाथों हाथ लिया था। तसलीमा को भी वहां मुक्त समाज में रहना भाया होगा। स्त्री-पुरुष समानता के तरह-तरह के रंग भी उन्हें यूरोप की धरती पर दिखाई दिए होंगे। चूंकि सामान्यतः एक लेखक या कवि की दिली ख्वाहिश अंततः अपने समाज में ही जीने की होती है, इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं था कि तसलीमा को जल्द ही अपना सुंदर, लेकिन निर्वासित जीवन एक बोझ की तरह लगने लगा। अपने मादरे वतन से अपनी जुदाई पर उन्होंने कई सुंदर और मार्मिक कविताएं लिखीं और यूरोप छोड़कर भारत में आ बसने का फैसला किया। भारत सरकार ने झिझक के साथ ही सही, अंततः उन्हें वीजा दिया और वे भारत आ सकीं।
1994 में बांग्लादेश से निर्वासित होकर तसलीमा 2004 तक यूरोप में रहीं और फिर भारत आने के बाद तीन साल उन्होंने कोलकाता बिताए। वे जब तक कोलकाता में रहीं, धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की आजादी की बहुत बड़ी पैरोकार मानी जाने वाली पश्चिम बंगाल की तत्कालीन वाममोर्चा सरकार ने कभी भी सहज रूप से उनकी उपस्थिति को स्वीकार नहीं किया। जब पश्चिम बंगाल के मजहबी कट्टरपंथियों ने उनके खिलाफ फतवा जारी किया तब भी वाममोर्चा सरकार ने उन कट्टरपंथियों के खिलाफ सख्ती से पेश आने के बजाय तसलीमा पर दबाव बनाया कि वे कोलकाता छोड़ दें। तसलीमा कोलकाता छोड़कर दिल्ली आ गईं। अब चूंकि पश्चिम बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य बदला हुआ है और वाम मोर्चा सत्ता से बाहर हो चुका है, तो तसलीमा को फिर उम्मीद बंधी है कि उन्हें कोलकाता लौटने की इजाजत मिल जाएगी।
वर्ष 2004 से अब तक टुकड़ों-टुकड़ों में तसलीमा के वीसा की अवधि बढ़ाई जाती रही है। अफसोस की बात यह है कि उन्हें राजनीतिक शरण देने का मुद्दा तो कायदे से उठ ही नहीं पाया है। सभी राजनीतिक दलों ने इस मामले में अघोषित आमसहमति से शर्मनाक चुप्पी साध रखी है। हां, 2004 से लेकर अब तक जब-जब तसलीमा के वीसा की अवधि अस्थाई तौर पर बढ़ाई गई तब-तब तक भारत सरकार की ओर से यह जरूर कहा गया है कि तसलीमा को भारत की परंपरा और धार्मिक भावनाओं के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए। इस मासूम सी लगने वाली हिदायत का निहितार्थ यह है कि सरकार में बैठे लोग चाहते है कि तसलीमा को भारत में रहते हुए बांग्लादेशी समाज के मुल्ला मौलवियों की रुढ़िवादी विचारधारा और सांप्रदायिक कारगुजारियों के खिलाफ अपना मुंह बंद रखना चाहिए, ताकि भारत के कट्टरपंथी मुल्ला-मौलवी नाराज न हो। तसलीमा को स्थायी नागरिकता या राजनीतिक शरण देने के सवाल पर शायद यह कूटनीतिक संकोच भी आड़े आता होगा कि इससे बांग्लादेश से हमारे द्विपक्षीय रिश्ते खराब होंगे।
सवाल उठता है कि क्या एक लेखिका के लिए इतनी बड़ी राजनयिक जोखिम उठाई जानी चाहिए? जी हां, जरूर उठाई जानी चाहिए। माना कि तसलीमा के लेखन का साहित्यिक मूल्य बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है? हर देश काल में कुछ ऐसा तूफानी लेखन होता है जो साहित्य के पैमाने पर बहुत ज्यादा ऊंचे दर्जे का भले ही न हो, पर तात्कालिक तौर पर गहरी हलचल मचाता है। भारतीय, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी जैसे समाजों में ऐसा लेखन सामाजिक बदलाव का असरदार औजार बन सकता है। इसलिए तसलीमा नसरीन को भारत में स्थायी रूप से बसने की अनुमति दी जानी चाहिए। तसलीमा भी इस आशय की मंशा एक से अधिक बार जाहिर कर चुकी है।
भारत सरकार का यह फर्ज बनता है कि वह तसलीमा को आश्वस्त करे कि भारत उनका घर है, वे जब तक चाहें, यहां रह सकती हैं और चाहे तो भारत की नागरिकता भी प्राप्त कर सकती है। भारत ने अपनी आजादी के तुरंत बाद लगभग छह दशक पहले चीन की नाराजगी मोल लेते हुए दलाई लामा और उनके हजारों अनुयायियों को राजनीतिक शरण दी थी, जो आज भी भारत में यहां-वहां रह रहे हैं। हालांकि स्टालिन की बेटी स्वेतलाना के मामले में हमारे तत्कालीन हुक्मरान सोवियत संघ (रूस) से डर गए थे। उस समय का कलंक अभी तक हमारे माथे पर लगा हुआ है। तसलीमा को भारत में शरण देकर उस कलंक को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
यहां यह भी याद रखा जाना चाहिए कि ईरान के मजहबी नेता अयातुल्लाह खुमैनी के फरमान की परवाह न करते हुए ब्रिटेन ने किस तरह सलमान रुश्दी का साथ दिया था। यह अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करने या उसे संरक्षण देने की अद्वितीय मिसाल थी। एशिया महाद्वीप में यह भूमिका भारत भी निभा सकता है। हमारा देश 'वादे वादे जायते तत्वबोधः' का है। यहां तो वेदों को भी चुनौती दी गई है और ईश्वर को भी नकारा गया है। तसलीमा के रहने के लिए भारत से बेहतर जगह और हो भी क्या सकती है। पचास के दशक में समाजवादी चिंतक डॉ राममनोहर लोहिया ने विश्व नागरिकता की अपनी अवधारणा पेश करते हुए कहा था कि  हमारी एक भारत माता है तो एक धरती माता भी है। इसी आधार पर तसलीमा के लिए एक बांग्ला मां है तो एक धरती मां भी होनी चाहिए। और फिर महज 64 वर्ष पहले तक तो भारत माता और बांग्ला माता एक ही थीं। नालायक बेटों की नासमझी ने भले ही मां को बांट दिया हो, पर लायक बेटे तो समझदारी दिखाते हुए उसे फिर से जोड़ सकते हैं। दरअसल, तसलीमा के रहने के लिए भारत से ज्यादा उपयुक्त जगह कोई हो भी नहीं सकती। वह यहां एक ऐसे समाज में रह सकेगी जो उनके संघर्ष को आदर की दृष्टि से देखता है और जहां वे बांग्ला बोल-सुन सकेगी। मछली आखिर पानी में ही तो रह सकती है। उसे पानी में स्थायी रूप से रहने की इजाजत क्यों नहीं मिलनी चाहिए?

हीनताबोध पैदा करते विज्ञापन

भारतीय समाज में सुंदर देहयष्टि और त्वचा के गोरेपन को लेकर तमाम तरह के पूर्वाग्रह सदियों से अपनी जड़ें जमाए हुए हैं। इसी के चलते अपने को गौरवर्ण और छरहरा बनाने-दिखाने की ललक भी कोई नई बात नहीं है। शरीर के सांवलेपन को दूर कर उसे गोरा बनाने के लिए तरह-तरह के लेप और उबटनों का उपयोग भी हमारे यहां प्राचीनकाल से होता आया है। लेकिन कोई दो दशक पहले शुरू हुई बाजारवादी अर्थव्यवस्था और वैश्वीकरण की विनाशकारी आंधी ने इस सहज प्रवृत्ति को एक तरह से पागलपन में तब्दील कर दिया है। 
माना जाता है कि बाजार में होने वाली प्रतियोगिता उपभोक्ता और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए फायदेमंद होती है। लेकिन इस प्रतियोगिता में कई तरह का विकृतियां भी दिखाई देती हैं। अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने और मुनाफा कमाने के फेर में बहुत से विज्ञापनों, खासकर सौंदर्य प्रसाधनों और शरीर को आकर्षक बनाने वाले उत्पादों के विज्ञापनों में भ्रामक दावे किए जाते हैं। कथित तौर पर गोरा बनाने वाली क्रीम और मोटापा घटाने की दवाइयों के टीवी चैनलों पर आने वाले विज्ञापनों ने किशोर और युवा मन की संवेदनाओं का शोषण करते हुए उनके मानस पटल पर देह की बनावट और चमड़ी के रंग पर रचा सौंदर्य का यह पैमाना गहराई से अंकित कर दिया है कि गोरे रंग और छरहरी काया के बगैर न तो मनचाहा हमसफर मिल सकता है और न ही रोजगार।  
चमड़ी के गोरे रंग पर आधारित पश्चिम की इस रंगभेदी सौंदर्य दृष्टि से उपजा हीनताबोध और कुंठा कितनी खतरनाक होती है, इसकी सबसे बड़ी मिसाल रहे हैं मशहूर पॉप गायक माइकल जैक्सन। जिस समय पश्चिमी समाज में रंगभेद के खिलाफ जारी संघर्ष अपने निर्णायक दौर में था, गौरांग 'महाप्रभुओं' के यूरोपीय देशों सहित पूरी दुनिया में इस श्यामवर्णी लोकप्रिय कलाकार की पॉप गायकी का जादू छाया हुआ था। बेपनाह दौलत और शोहरत हासिल करने के बाद अपनी त्वचा को काले रंग से छुटकारा दिलाने की कुंठा जनित ललक में जैक्सन ने अपने शरीर की प्लास्टिक सर्जरी कराई थी। इस सर्जरी से वह गोरा तो हो गया था, लेकिन सर्जरी और दवाओं के दुष्प्रभावों के चलते उसे कई तरह की बीमारियों ने अपना शिकार बना लिया था, जो आखिरकार उसकी मौत का कारण बन गईं। जैक्सन की बहन जेनिथ जैक्सन तो आज भी अपने काले रंग के बावजूद पॉप गायकी के क्षेत्र में धूम मचाए हुए है। इसी सिलसिले में चर्चित मॉडल नाओमी कैंपबेल का जिक्र  भी किया जा सकता है जो अपनी नैसर्गिक प्रतिभा के दम पर आज ग्लैमर की दुनिया में सुपर मॉडल के तौर पर जानी जाती है। उसकी इस उपलब्धि में उसकी त्वचा का काला रंग कहीं से आड़े नहीं आया। व्यक्ति की कामयाबी में चमड़ी के गोरे रंग की कोई भूमिका नहीं होती, इस तथ्य को जोरदार तरीक से साबित करने वालों में बराक ओबामा का नाम भी शुमार किया जा सकता है, जो आज दुनिया के सबसे ताकतवर देश कि राष्ट्रप्रमुख हैं।  
बहरहाल, हमारे यहां प्रचार माध्यमों और सार्वजनिक स्थानों पर ऐसे विज्ञापन आम हैं जिनमें मोटापा घटाने, गोरा बनाने, सौंदर्य निखारने, कद बढ़ाने आदि के दावे तथा वस्तुओं पर भारी छूट, एक के साथ एक मुफ्त और आकर्षक उपहारों के वादे किए जाते हैं। अनुमानतः हमारे देश में आज गोरा बनाने वाली क्रीम और अन्य उत्पादों का बाजार करीब दो हजार करोड़ रूपए का है। इसी के साथ मोटापा घटाने वाली दवाओं का बाजार भी तेजी से कुलांचे भरता हुआ लगातार बढ़ता जा रहा है। जबकि हकीकत यह है कि इस तरह की क्रीमों और दवाओं से चमड़ी का रंग बदलना और मोटापा कम होना तो दूर, उलटे इन चीजों के इस्तेमाल से दूसरी बीमारियां जन्म ले लेती हैं। लेकिन मुनाफा कमाने की होड़ में शामिल इन कंपनियों और इनके विज्ञापन प्रसारित करने वाले प्रचार माध्यमों पर इन बातों का कोई असर नहीं होता है। इन उत्पादों को लोकप्रिय बनाने के लिए फिल्म, टीवी और खेल जगत के सितारों से इनके विज्ञापन  कराए जाते हैं।  
विडंबना यह है कि सांवले और मोटे लोगों में हीनता-बोध पैदा कर उनकी नैसर्गिक योग्यता पर नकारात्मक असर डालने वाले इन विज्ञापनों में किए गए दावों की असलियत जांचने के लिए हमारे यहां न तो कोई कसौटी है और न ही ऐसे भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाने के लिए कोई असरदार तंत्र। ऐसे विज्ञापनों पर रोक लगाने की मांग किसी राजनीतिक दल के एजेंडा में भी आज तक जगह नहीं पा सकी है। अलबत्ता मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की महिला शाखा जरूर इस बात को उठाती रही है, लेकिन उसकी पहल नक्कारखाने में तूती की आवाज ही साबित हुई है। संतोष की बात है कि देर से ही सही, प्रधानमंत्री कार्यालय की नजर गोरा बनाने वाली क्रीम और मोटापा घटाने वाली दवाओं के फरेबी विज्ञापनों की ओर गई है। उसने ऐसे विज्ञापनों के सामाजिक दुष्प्रभावों को गंभीरता से लेते हुए इन पर नियंत्रण की प्रणाली तुरंत स्थापित करने के निर्देश दिए हैं। प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव टीकेए नायर ने इस सिलसिले में उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बैठक कर उनसे कहा है कि उनके विभाग को ऐसी नियामक प्रणाली विकसित करनी चाहिए जिससे लोगों को भ्रमित करने वाले ऐसे विज्ञापनों के प्रसार पर रोक लगे। विभाग को एक महीने के भीतर इस बारे में दिशा-निर्देशों का मसौदा तैयार करने को कहा गया है। बताया गया है कि नियामक प्रणाली को जल्द से जल्द अमल में लाया जाएगा, क्योंकि प्रधानमंत्री कार्यालय इस मुद्दे को लेकर बहुत गंभीर है। प्रस्तावित दिशा-निर्देशों में वे सब विज्ञापन आएंगे, जो गोरा बनाने, मोटापा दूर करने और इसी तरह के अन्य झांसे लोगों को देते हैं।  
सरकार ने जो पहल की है वह अपनी जगह है। उसकी सफलता की कामना करनी चाहिए, लेकिन यह सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा मामला भी है। आखिर चमड़ी के रंग और शरीर के आकार-प्रकार पर आधारित खूबसूरती और कामयाबी का यह विकृत पैमाना स्वस्थ समाज के निर्माण में कैसे सहायक हो सकता है? इस तरह के पैमाने रचने वाली मानसिकता के खिलाफ व्यापक स्तर पर मुखर सामाजिक आंदोलन भी समय की मांग है। इस सिलसिले में पिछले दिनों मिस यूनिवर्स चुनी गई अंगोला की लीला लोपेज की मिसाल सामने रखी जा सकती है, जिसने देह और रंग के कठघरे में कैद सुंदरता के पैमाने को करारा झटका दिया है। उसने मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता के दौरान पूछे गए एक सवाल के जवाब में बेबाकी से कहा कि अगर मुमकिन हो तो भी वह अपने रंग-रूप में कोई बदलाव करना नहीं चाहेंगी और वैसी ही दिखना पसंद करेंगी, जैसा कुदरत ने उसे बनाया है। उसने यह भी कहा कि वह अपने स्वाभाविक रंग-रूप से संतुष्ट और खुश है तथा खुद को ऐसी स्त्री के रूप में देखना चाहती है जो भीतर से सुंदर हो। प्रश्न पूछने वाले विशेषज्ञों को लाजवाब कर देने वाला लीला लोपेज का यह जवाब आज की दुनिया में सौंदर्य के प्रचलित मानदंडों के बारे में नई तरह से सोचने का और खूबसूरती निखारने वाले भ्रामक विज्ञापनों से बचने आग्रह करता है। 

Tuesday, September 20, 2011

नरेंद्र मोदी की सद्भावना के मायने


'यह नैतिकता क्या चीज होती है?" अपने 'सद्भावना मिशन" के तहत तीन दिन के उपवास पर बैठे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह प्रतिप्रश्न एक टीवी चैनल के संवाददाता के उस प्रश्न के जवाब में किया था, जिसमें उनसे पूछा गया था कि क्या वे गुजरात में 2002 में हुई सांप्रदायिक हिंसा की नैतिक जिम्मेदारी लेने को तैयार है? प्रश्न पूरा होते ही मोदी ने अपना उक्त प्रतिप्रश्न दागा था। इसी के साथ उन्होंने कहा- 'जब मेरे खिलाफ गुजरात के किसी पुलिस थाने में कोई एफआईआर तक दर्ज नहीं है तो मैं किस बात की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करूं।" जिस राज्य में सांप्रदायिक हिंसा में एक वर्ग विशेष के दो हजार से ज्यादा निर्दोष लोगों की मौत हो गई हो, उसके बारे में उक्त दंभपूर्ण और गैरजिम्मेदाराना उद्गार व्यक्त करने वाला उस राज्य का मुखिया किस तरह का सद्भाव कायम करना चाहता है, यह आसानी से समझा जा सकता है। वैसे भी मोदी को उनके समर्थक और प्रशंसक 'विकास का अग्रदूत" और 'प्रबंध पुरूष" मानते हैं और खुद मोदी भी अपने बारे में ऐसा ही दावा करते दिखते हैं, इसलिए उनसे नैतिक होने की अपेक्षा करना बेमतलब है। क्योंकि हमारे देश में विकास और प्रबंध का जो शास्त्र चलन में है, उसमें नैतिकता के लिए कोई जगह है ही कहां? शायद इसीलिए मोदी कहते हैं कि 'यह नैतिकता क्या होती है?" सवाल उठता है कि नरेंद्र मोदी को अपने दस साल के शासन में पहली बार इस समय ही गुजरात में सद्भाव का वातावरण बनाने की जरूरत क्यों महसूस हुई? सन् 2002 में गुजरात में हुए भीषण सांप्रदायिक जनसंहार से जुड़े एक मामले में मोदी की भूमिका की जांच संबंधी रिपोर्ट पर एसआईटी की रिपोर्ट पर 12 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा कोई फैसला देने से इनकार करने और मामले की सुनवाई मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत को करने का आदेश दिए जाने पर तीन दिन की चुप्पी के बाद मोदी ने अचानक घोषणा की कि वे राज्य में सद्भावना का वातावरण बनाने के लिए तीन दिन का उपवास करेंगे। अपने 61 वें जन्मदिन (17 सितंबर) से उन्होंने तीन दिन का उपवास किया।
अहमदाबाद स्थित गुजरात विश्वविद्यालय के भव्य और वातानुकूलित कन्वेंशन हॉल में उपवास पर बैठने से पहले भारतीय जनता पार्टी के तमाम बड़े नेताओं तथा राज्य के विभिन्न् वर्गों के आए हुए और लाए हुए लगभग पांच हजार लोगों के समक्ष मोदी के 45 मिनट के भाषण में दंभोक्तियां और आत्म-मुग्धता तो भरपूर थी, लेकिन जिस सद्भावना के लिए वे उपवास कर रहे थे, उसके लिए आवश्यक विनम्रता बिल्कुल नहीं थी। निर्गुण और निराकार विकास के मंत्रोच्चार से युक्त भाषण में कोई नई बात थी तो वह यह कि उन्होंने मुसलमानों को लेकर कोई कटुतापूर्ण या फूहड़ताभरी टिप्पणी नहीं की, जो कि वे अक्सर अपने प्रशंसकों को गुदगुदाने और हंसाने के लिए करते रहते हैं। कुल मिलाकर उनके पूरे भाषण का लब्वोलुआब यह रहा कि अब वे अपनी छवि बदलने के लिए छटपटा रहे हैं और अपनी पार्टी को नेतृत्व देने और राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका निभाने को आतुर हैं। यानी दस साल से गुजरात में राज कर रहे मोदी के सामने अगले वर्ष होने वाले गुजरात विधानसभा के चुनाव तो हैं ही, उनकी नजरें उसके बाद 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर भी हैं। मतलब यह कि अब वे अपनी स्वीकार्यता बढ़ाकर अपने को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश करना चाहते हैं। यही वजह है कि 'सद्भावना मिशन" के नाम से सरकारी खर्च पर आयोजित इस मेगा शो में शामिल होने के लिए उन्होंने अपनी पार्टी के आला नेताओं के साथ ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के घटक दलों के नेताओं और भाजपा व राजग शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी दावत दी, जिसे जनता दल (यू) के अध्यक्ष और राजग के संयोजक शरद यादव तथा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अलावा सबने कुबूल किया। इस मौके पर लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह, अस्र्ण जेटली आदि भाजपा के तमाम नेताओं ने मोदी पर अपने शब्दाडंबर के चंवर डुलाते हुए उनकी महत्वाकांक्षा को सहलाने में कोई कोताई नहीं की।
अगर वाकई सद्भावना का वातावरण बनाना ही मोदी का मकसद होता तो उनके लिए उपवास करने का माकूल मौका तब था जब गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस पर 27 फरवरी, 2002 को हुए हमला हुआ था, जिसमें अयोध्या से लौट रहे उनसठ लोग आग में जल कर मर गए थे। अगर उन्होंने उस वक्त उपवास किया होता तो गुजरात सांप्रदायिक हिंसा की उस आग में झुलसने से बच जाता और दो हजार से ज्यादा बेगुनाह मुसलमानों का कत्लेआम न हुआ होता। लेकिन मोदी उस समय सद्भावना की नहीं बल्कि सांप्रदायिक नफरत की आग को हवा देने वाली सिर्फ बातें ही नहीं, काम भी कर रहे थे। उस समय उन्होंने पुलिस प्रशासन से कहा था- 'हिंदुओं के आक्रोश को रोको मत, उसे प्रकट हो जाने दो।" राज्य के खुफिया विभाग के अधिकारियों के मना करने के बावजूद उन्होंने जली हुई लाशों को गोधरा से अहमदाबाद लाने से नहीं रोका। लाशों का जुलूस निकाला गया और साथ ही शहर के मुस्लिम बहुल इलाकों को उन्मादी दंगाइयों के हवाले कर दिया गया। उस वक्त हुए खूनखराबे से व्यथित  होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था- 'नरेंद्र मोदी को अपना राजधर्म निभाना चाहिए।" लेकिन वाजपेयी की इस नसीहत का मोदी पर कोई असर नहीं हुआ और महात्मा गांधी का गुजरात सांप्रदायिकता हिंसा की आग में धू-धू कर जलता रहा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कोख से जन्मे भाजपा समेत तमाम संगठन और नरेंद्र मोदी की चाटुकारिता कर अपना उल्लू सीधा करने वाले पुलिस अधिकारी मोदी को 'हिंदू ह्रदय सम्राट" के रूप में महिमा मंडित करने में जुट गए। उस समय मोदी की सरकार में गृह मंत्री रहे हरेन पंड्या ने नागरिक अधिकार संगठनों द्वारा नियुक्त जांच आयोग के सामने कुबूल किया था कि सरकार ने जान-बूझकर मुसलमानों पर हुए हिंसक हमलों को रोकने के कोई प्रयास नहीं किए। कुछ समय बाद ही मौका आया मोदी के विधानसभा का उपचुनाव लड़ने का। मोदी एलिस ब्रिज विधानसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे, जिसका प्रतिनिधत्व उस समय हरेन पंड्या कर रहे थे। मोदी चाहते थे कि पंड्या वह सीट उनके लिए खाली कर दे, लेकिन  पंड्या ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था। मोदी को मणिनगर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ना पड़ा, जो उनकी ही सरकार के एक अन्य मंत्री वजुभाई बाला ने इस्तीफा देकर खाली की थी। कुछ ही दिनों बाद हरेन पंड्या की कुछ लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी। उनकी लाश को देखने मोदी उस समय के केंद्रीय गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के साथ अस्पताल पहुंचे तो आक्रोश से भरे पंड्या समर्थकों ने उनके खिलाफ काफी नारेबाजी की थी। उस समय भी मोदी को उपवास करने की जरूरत महसूस नहीं हुई।
फिर दिसंबर, 2002 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी सद्भावना और भाईचारे की बात करने के बजाय मोदी ने 'पाकिस्तान प्रेरित मुस्लिम आतंकवाद" पर हिंदुओं को उत्तेजित करने और भड़काने वाले भाषण दिए। इन भाषणों में अपनी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ को तराजू के एक ही पलड़े पर रखते हुए मोदी ने ऐसा माहौल रच दिया था मानो विधानसभा का चुनाव नहीं बल्कि भारत और पाकिस्तान के बीच युध्द हो रहा हो। पूरे राज्य में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के बल पर मोदी भारी बहुमत से भाजपा को जिताकर अपनी सत्ता बरकरार रखने में कामयाब तो हो गए पर उन्होंने गुजरात में सांप्रदायिक तनाव बढ़ाकर बचे-खुचे सद्भाव का भी नामोनिशान मिटा दिया।
सद्भावना कायम करने के लिए उपवास पर बैठे नरेंद्र मोदी ने तीनों दिन अपने भाषणों में बार-बार अपने आपको छह करोड़ गुजरातियों के मसीहा के रूप में पेश किया और कहते  रहे कि गुजरात के हर नागरिक का दुख-सुख उनका अपना दुख-सुख है। लेकिन इस दौरान उन्होंने उस समय भी कोई सद्भावना या सौजन्य नहीं दिखाया जब उनके सहयोगी रहे हरेन पंड्या की विधवा जागृति पंड्या ने अपने पति के हत्यारों का पता लगाने और उन्हें सजा दिलाने की गुहार लेकर उनसे उपवास स्थल पर मिलने की कोशिश की। मोदी की पुलिस ने जागृति पंड्या को उपवास स्थल से एक किलोमीटर पहले ही रोक दिया और मोदी से नहीं मिलने दिया। पंड्या की पत्नी ने इस मौके पर मोदी को शुभकामना देने के लिए अहमदाबाद पहुंचे लालकृष्ण आडवाणी से भी मिलने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने भी उनसे मिलने से इनकार कर दिया और कहा कि वे मिलना चाहती हैं तो दिल्ली आकर मिले। इतना ही नहीं मोदी के उपवास के दिन अहमदाबाद पहुंची सुषमा स्वराज ने भी मोदी का तो काफी गुणगान किया और उन्हें एक आदर्श मुख्यमंत्री निरूपित किया लेकिन पंड्या की पत्नी से मिलकर उनकी आहत भावनाओं पर अपनी हमदर्दी का मरहम लगाना उचित नहीं समझा। यह थी मोदी और उनकी पार्टी के नेताओं की छद्म सद्भावना की एक और बानगी।
सुप्रीम कोर्ट ने 2002 की भीषण सांप्रदायिक हिंसा को लेकर मोदी पर लगे आरोपों की सुनवाई मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट को करने का जो आदेश दिया है उसे समूची भाजपा और संघ परिवार मोदी की जीत बता रहा है। खुद मोदी भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले की व्याख्या इस तरह कर रहे हैं मानो उन्हें बरी कर दिया गया हो। सुप्रीम कोर्ट के फैसले की यह मनमानी व्याख्या जनता को गुमराह करने वाली तो है ही, इससे भी ज्यादा यह मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत पर दबाव बनाने का आपराधिक प्रयास है। प्रकारांतर से वे यह भी जता रहे हैं कि निचली अदालत तो उनकी जेब में है और वहां से वही फैसला होगा, जैसा वे चाहेंगे। जाहिर है कि ऐसा करके वे एक तरह से न्याय व्यवस्था की सरासर खिल्ली उड़ा रहे हैं। 
मोदी ने अपने उपवास करने की घोषणा गुजरात की जनता के नाम एक खुले पत्र में की, जो देशभर के अखबारों में गुजरात सरकार के विज्ञापन के रूप में प्रकाशित हुआ। इस पत्र में उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अब तक चल रहे सभी विवादों का अंत कर दिया और उन लोगों को झूठा साबित कर दिया, जो गुजरात की छह करोड़ जनता को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। इस पत्र में मोदी ने अपने ऊपर लगे आरोपों को इस रूप में पेश किया मानो ये आरोप उन पर नहीं, गुजरात की जनता पर हों। मोदी के इस पत्र की भाषा से आपातकाल में दिए गए उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरूआ के उस बहुचर्चित बयान की बू आती है, जिसमें बरूआ ने चाटुकारिता का खतरनाक स्तर पार करते हुए कहा था- 'इंदिरा ही भारत है और भारत ही इंदिरा है।" अब मोदी भी अपने को गुजरात का पर्याय बता रहे हैं। यह विडंबना ही है कि जो गुजरात एक दशक पहले तक गांधी के लिए जाना जाता था, उसे अब परोक्ष-अपरोक्ष रूप से नरेंद्र मोदी का गुजरात बताने की भौंडी कोशिशें की जा रही हैं।