Tuesday, September 25, 2012

नग्न बाजारवाद का बेशर्म परीक्षण



इन दिनों अर्थ व्यवस्था से जुड़ी सबसे बड़ी और सबसे बुरी खबर यह है कि आम आदमी को महंगाई से राहत मिलती नहीं दिख रही है। अनाज, दाल-दलहन, फल, सब्जी, दूध इत्यादि आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं और फिलहाल अंदेशा यही है कि ये कीमतें आगे और भी बढ़ेंगी। ऐसे में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों की इस मार को महंगाई कहना उचित या पर्याप्त नहीं है। यह साफ तौर पर बाजार द्बारा जनता के साथ की जा रही लूट-खसोट है। ऐसा नहीं है कि महंगाई का कहर कोई पहली बार टूटा हो। महंगाई पहले भी होती रही है, जरूरी चीजों के दाम पहले भी अचानक बढ़ते रहे हैं, लेकिन थोड़े समय बाद फिर नीचे आए हैं। लेकिन इस समय तो मानों बाजार में आग लगी हुई है। वस्तुओं की लागत और उनके बाजार भाव में कोई संगति नहीं रह गई। इस मामले में आम आदमी तो असहाय है ही, सरकार भी खुद को लाचार और असहाय पा रही है। उसकी तमाम कोशिशों का कोई असर होना तो दूर, उलटे सरकारी नीतियों से महंगाई बढ़ती जा रही है। यही नहीं, खुद सरकार भी आए दिन पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम बढ़ाकर और अपनी इस करनी को देश के आर्थिक विकास के लिए जरूरी बताकर आम आदमी के जले पर नमक छिड़कने का काम कर रही है। कीमतों इस दोहरी मार ने आम आदमी के भोजन के इंतजाम को इकहरा कर दिया है।
अब यह याद करने या गिनने की कवायद बेमतलब है कि सरकार की ओर से कितनी बार यह वादा किया गया है कि महंगाई पर शीघ्र ही काबू पा लिया जाएगा। खुद प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को भी यह गिनती पता नहीं होगी कि उन्होंने इस आशय के बयान कितनी बार दिए। सरकार की ओर से कीमतों में उछाल के जो भी स्पष्टीकरण दिए गए हैं, वे भरोसा करने लायक नहीं हैं। मानसून कमजोर रहा या पर्याप्त बारिश नहीं हुई, ये ऐसे कारण नहीं हैं कि इनका असर सभी चीजों पर एक साथ पड़े। इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि कीमतें इतनी ज्यादा होने के बावजूद बाजार में किसी भी आवश्यक वस्तु का अकाल-अभाव दिखाई नहीं पड़ता। जब आपूर्ति कम होती है तो बाजार में चीजें दिखाई नहीं पड़ती और उनकी कालाबाजारी शुरू हो जाती है। अभी तो जमाखोरी हो रही है और ही कालाबाजारी। हो रही है तो सिर्फ बेहिसाब-बेलगाम मुनाफाखोरी। ऐसा महसूस होता है मानो सरकार या कहें कि सरकारों ने अपने आपको आम जनता से काट लिया है। यह हमारे लोकतंत्र का बिल्कुल नया चेहरा है- घोर जननिरपेक्ष और शुद्ध बाजारवादी चेहरा।
इस नई शक्ल वाले लोकतंत्र में ज्यादातर विपक्षी दलों का चाल, चेहरा और चरित्र भी सरकार से भिन्न नहीं है। कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के अब तक के लगभग आठ वर्ष के शासनकाल में कोई बारह मर्तबा संसद में महंगाई के सवाल पर बहस हुई है। अंतिम बार बहस पिछले वर्ष अगस्त महीने में मानसून सत्र के दौरान हुई थी। उस बहस में विपक्ष ने और खासतौर पर प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने महंगाई की चक्की में पिस रही जनता की बदहाली और बेबसी का खूब बखान किया था। सत्तापक्ष की ओर से भी आम आदमी की दुश्वारियों को लेकर खूब घड़ियाली आंसू बहाए गए था। मगर इसी के साथ उसने महंगाई के मामले में कुछ भी करने से हाथ खड़े करते हुए कह दिया था कि उसके पास कोई जादू की छड़ी तो है नहीं जिससे कि वह महंगाई को एक झटके में खत्म कर दे। इसी के साथ यह सिद्धांत भी पेश किया गया था कि महंगाई बढ़ने से ऊंची विकास दर का कोई ताल्लुक नहीं है और अगर हो भी तो महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए ऊंची विकास दर को कुर्बान नहीं किया जा सकता। मुख्य विपक्षी दल ने वित्त मंत्री की ओर से महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाने का आश्वासन मिलने पर निराशा तो जताई थी, लेकिन ऊंची विकास दर को प्राथमिकता देने के सिद्धांत को बिना किसी आपत्ति के स्वीकार कर लिया था। यह बहस लोकसभा की नियम संख्या-184 के तहत हुई थी। इस नियम के तहत होने वाली बहस का समापन मतदान से होता है। लेकिन सत्तापक्ष और आधिकारिक विपक्ष यानी भारतीय जनता पाटी्र की आपसी समझदारी के चलते मतदान के बजाय महंगाई पर चिंता जताने वाला एक प्रस्ताव लाया गया जो लोकसभा ने सर्वसम्मति से तो नहीं मगर भारी बहुमत से जरूर पारित कर दिया। इस प्रस्ताव पर वामपंथी दलों ने संशोधन पेश किया था जिसमें महंगाई पर काबू पाने में नाकामी के लिए सरकार की आलोचना का प्रस्ताव था। इस संशोधन के खिलाफ सत्तापक्ष और भाजपा ने एकजूट होकर मतदान किया था। यह एक घटना ही यह बताने के लिए पर्याप्त है कि महंगाई के सवाल पर सत्तापक्ष और मुख्य विपक्षी दल की संवेदनाएं कितनी बोगस है।
कुछ साल पहले तक जब किसी चीज के दाम असामान्य रूप से बढ़ते थ्ो तो सरकार हस्तक्षोप करती थी। यह अलग बात है कि इस हस्तक्षप का असर कुछ खास नहीं होता था, क्योंकि उस मूल्यवृद्धि की वजह वाकई उस चीज की दुर्लभता होती थी। अब तो सरकार बिल्कुल बेफिक्र है- महंगाई का कहर झेल रही जनता को लेकर भी और जनता को लूट रही बाजार की ताकतों को लेकर भी। उसने बाजार को आजादी दे दी है कि तुम जो चाहो करो, हम तुम्हारे आड़े नहीं आएंगे। सरकारें आमतौर पर महंगाई बढ़ने पर उसके लिए जिम्मेदार बाजार के बड़े खिलाड़ियों को डराने या निरुत्साहित करने के लिए सख्त कदम भले ही उठाए पर सख्त बयान तो देती ही हैं। लेकिन अब तो कभी हमारे देश के कृषि मंत्री का बयान आता है कि कीमतें अभी और बढ़ सकती हैं तो कभी योजना आयोग के उपाध्यक्ष फरमाते हैं कि महंगाई अभी कुछ दिन और बनी रहेगी। उनके इस तरह के मूर्खता या मक्कारी भरे बयान मुनाफाखोरों को लूट की खुली छूट देते हैं। अगर इस महंगाई का कुछ हिस्सा उत्पादकों तक पहुंच रहा होता और अनाज सब्जियां उगाने वाले छोटे किसान मालामाल हो रहे होते, तब भी कोई बात थी। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। इस अस्वाभाविक महंगाई का लाभ तो बिचौलिये और मुनाफाखोर बड़े व्यापारी उठा रहे हैं। अगर सरकार को जनता की तकलीफों का जरा भी अहसास हो या उससे हमदर्दी हो तो वह अपने खुफिया तंत्र से यह पता लगा सकती है कि कीमतों में उछाल आने की प्रक्रिया कहां से शुरू हो रही है और इसका फायदा किस-किसको मिल रहा है। यह पता लगाने में हफ्ते-दस दिन से ज्यादा का समय नहीं लगता। लेकिन कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी की ऐसी कोई व्याख्या या वजह उपलब्ध नहीं है जो समझ में सके। ऐसा लगता है कि मानो किसी रहस्यमयी शक्ति ने बाजार को अपनी जकड़न में ले लिया है, जिसके आगे आम जनता ही नहीं, सरकार और प्रशासन तंत्र भी असहाय और लाचार है।
महंगाई पर लगाम लगाने के मकसद से पिछले दो साल के दौरान रिजर्व बैंक एक दर्जन से भी ज्यादा बार रेपो और रिवर्स रेपो दरों में बढ़ोतरी कर चुका है। ऐसा करते वक्त सरकार की ओर से हर बार देश को दिलासा दी गई कि महंगाई जल्द ही काबू में जाएगी। लेकिन 'ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता ही गयाकी तर्ज पर महंगाई तो काबू में नहीं आई, उलटे घर और वाहन खरीदने के लिए कर्ज और महंगा हो गया। जाहिर है कि जन सरोकारी व्यवस्था की लगाम सरकार के हाथों से छूट चुकी है, जिसके कारण महंगाई का घोड़ा बेकाबू हो सरपट दौड़े जा रहा है। सब कुछ बाजार के हवाले है और बाजार की अपने ग्राहक या जनता के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है। यह नग्न बाजारवाद है, जिसका बेशर्म परीक्षण किया जा रहा है। सवाल उठता है कि अगर सब कुछ बाजार को ही तय करना है तोे फिर सरकार के होने का क्या मतलब है? हम जिस समाज में रह रहे हैं, उस पर क्या लोकतंत्र का कोई नियम लागू होता है?
सरकार अगर चाहे तो वह इस समय बढ़ते दामों पर काबू पाने के लिए दो तरह से हस्तक्ष्ोप कर सकती है। पहला तो यह कि अगर बाजार के साथ छेड़छाड़ नहीं करना है तो सरकार खुद ही गेहंू, चावल, दलहन, चीनी आदि वस्तुएं भारी मात्रा में बाजार में उतार कर कीमतों को नीचे लाए। ऐसा करने से उसे कोई रोक नहीं सकता, बशर्ते उसमें ऐसा करने की मजबूत इच्छाशक्ति हो। हस्तक्ष्ोप का दूसरा तरीका यह है कि बाजार पर योजनाबद्ध तरीके से अंकुश लगाया जाए। इसके लिए उत्पादन लागत के आधार पर चीजों के दाम तय कर ऐसी सख्त प्रशासनिक व्यवस्था की जाए कि चीजें उसी दाम पर बिके जो सरकार ने तय किए हैं। जब सरकार कृषि उपज के समर्थन मूल्य निर्धारित कर सकती है तो वह बाजार में बिकने वाली वस्तुओं की अधिकतम कीमतें क्यों नहीं तय कर सकती? मीडिया की सर्व व्यापकता और सक्रियता के दौर में निर्धारित कीमतों पर चीजें बिकवाना कोई मुश्किल काम नहीं है। ऐसा करने का नकारात्मक नतीजा यह हो सकता है कि कुछ दिनों के लिए आवश्यक वस्तुएं बाजार से गायब ही हो जाएं। बाजार बनाम सरकार का असली मोर्चा यही होगा। इस मोर्चे पर सरकार को बिचौलियों, जमाखोरों और Sेबाजों के खिलाफ सख्ती से पेश आना होगा, क्योंकि चीजों का बनावटी अभाव पैदा कर उनके दामों में मनमानी बढ़ोतरी यही लोग करते हैं। प्रशासन में अगर थोड़ी भी हिम्मत और संकल्पशक्ति हो तो वह बाजार को निरंकुश होने से रोक सकता है। ज्यादा से ज्यादा यही होगा कि सरकार अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाएगी लेकिन कुछ हद तक तो कामयाब होगी।
कीमतों का स्वभाव होता है कि एक बार चढ़ने के बाद वे बहुत नीचे नहीं आतीं। इस बार भी ऐसा ही होने का अंदेशा है। जब कीमतों में बढ़ोतरी रुपी सुनामी की लहरें थम जाएगी, तब सामान्य स्थिति में भी हम दोगुनी कीमतों पर आटा, दाल, चावल, चीनी आदि खरीद रहे होंगे। इसलिए अभी अगर सरकार की ओर से कारगर हस्तक्षेप नहीं हुआ तो आने वाले समय पर इस महंगाई की काली छाया पड़ना तय है। यह हस्तक्षेप अकेले केंद्र सरकार नहीं कर सकती, इसमें राज्य सरकारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। खासतौर पर जमाखोरों, मुनाफाखोरों और कालाबाजारियों पर लगाम कसने के मामले में कमान राज्य सरकारों के हाथ में होती है। इसलिए राज्य सरकारें महंगाई बढ़ने का ठीकरा केंद्र सरकार के सिर पर फोड़ कर अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकती। सरकारों को यह याद रखना चाहिए कि हद से ज्यादा बढ़ी महंगाई कभी-कभी सरकारों को भी मार जाती है।

Friday, February 24, 2012

ऐसे तो लड़ चुके आतंकवाद से




राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) के गठन पर लगभग एक दर्जन राज्यों के मुख्यमंत्रियों के कड़े एतराज के चलते आखिर केंद्र सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े और कहना पड़ा कि जब तक केंद्र और राज्यों के बीच सहमति नहीं बनेगी तब तक उस पर अमल स्थगित रखा जाएगा। दरअसल, यह भारत जैसे देश में ही संभव है कि आतंकवाद जैसी गंभीर समस्या से निपटने के सवाल पर भी राजनीतिक पार्टियां और सरकारें अपने राजनीतिक दांव-पेंच से बाज नहीं आती हैं। एनसीटीसी के गठन को लेकर केंद्र और कुछ राज्य सरकारों के बीच मचा घमासान, इस प्रवृत्ति की ताजा मिसाल है। आतंकवाद और आतंकवादियों को नेस्तनाबूद करने के मकसद से गठित यह संस्था वजूद में आने से पहले ही राज्यों के अधिकारों के नाम पर दलीय और क्षेत्रीय राजनीति का शिकार हो गई। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, ओड़िशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार के साथ ही आतंकवाद के मुद्दे पर सख्त दिखने का कोई मौका न गंवाने वाली भारतीय जनता पार्टी और उसके शासन वाले राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी संघवाद की दुहाई देते हुए इसके गठन पर एतराज जताया था। केंद्रीय मंत्री और नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला तथा तेलुगु देशम पार्टी के सुप्रीमो चंद्रबाबू नायडू भी एनसीटीसी के गठन से असहमति जताई थी।
 आतंकवाद पर अंकुश लगाने वाली इस एजेंसी को राज्यों के अधिकारों में दखलंदाजी और संविधान के संघीय ढांचे की मर्यादा का उल्लंघन बताया गया। विरोध करने वाले मुख्यमंत्रियों का आरोप है कि केंद्र सरकार ने उनसे सलाह-मशविरा किए बगैर ही एनसीटीसी का गठन कर दिया है और उसे राज्यों में संदिग्ध आतंकवादियों की तलाश में छापा डालने, जांच करने और गिरफ्तार करने के जो अधिकार दिए गए हैं वे राज्यों के संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण करने वाले हैं, लिहाजा एनसीटीसी के गठन से संबंधित अधिसूचना वापस ली जाए। कमोबेश यही दलील भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए पिछले दिनों बनाए जा रहे लोकपाल कानून के मामले में भी दी गई थी और लोकसभा में पारित होने के बावजूद ममता बनर्जी की पार्टी के घोर विरोध के चलते लोकपाल विधेयक राज्यसभा में पारित नहीं हो सका था। खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश पर भी राजनीतिक असहमति के चलते सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे। आशंका है कि लोकपाल विधेयक और खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के मसले जैसा ही हश्र अब इस प्रस्तावित आतंकवाद निरोधक केंद्र का भी हो सकता है। महत्वपूर्ण मसलों पर सरकार के पीछे हटने को विपक्ष भले ही अपनी जीत माने, पर देश-दुनिया में यही संदेश जा रहा है कि भारत का राजनीतिक नेतृत्व नीतियां बनाने और निर्णय लेने के मामले में जबर्दस्त रूप से दुविधा का शिकार है।
 एक तरफ मुख्य विपक्षी दल भाजपा और तमाम गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने राज्यों की स्वायत्तता और संघवाद की दुहाई देते हुए एनसीटीसी के गठन को संघीय ढांचे पर हमला बताया तो दूसरी तरफ गृह मंत्री पी चिदंबरम ने संविधान के अनुच्छेद 355 का हवाला देते हुए कहा कि देश की आतंरिक सुरक्षा केंद्र और राज्यों की साझा जिम्मेदारी है। केंद्र सरकार के फैसले का बचाव करते हुए कांग्रेस ने भी एनसीटीसी के गठन पर एतराज उठाने वालों को नसीहत दी कि उन्हें आतंकवाद से लड़ने की सामूहिक जिम्मेदारी में अपनी भूमिका समझनी चाहिए। केंद्र और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के साथ सत्ता में साझेदारी कर रही ममता बनर्जी अगर विरोध जताने वाले मुख्यमंत्रियों में शामिल नहीं होती तो कांग्रेस यह भी कह सकती थी कि आतंकवाद की चुनौती का मुकाबला करने को लेकर राजग या गैर कांग्रेसी दल और उनके मुख्यमंत्री गंभीर नहीं हैं।
केंद्र और कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच जारी इस मोर्चेबंदी से आम आदमी का परेशान होना स्वाभाविक है। उसे संघवाद और संविधान में वर्णित केंद्र और राज्यों के अधिकारों जैसे पेचीदा सवालों से कोई लेना-देना नहीं। वह तो बस यही चाहता है कि जैसे भी हो, आए दिन खून-खराबा मचाने वाले आतंकवाद से देश को निजात मिले। निश्चित ही एनसीटीसी के गठन पर छिड़ा राजनीतिक घमासान देश के आम आदमी को धक्का पहुंचाने वाला है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि एक ओर तो केंद्र सरकार की इस बात के लिए आलोचना की जाती है कि वह आतंकवाद के खिलाफ सख्त कानूनी और सुरक्षात्मक कदम उठाने को लेकर गंभीर नहीं है। ऐसी आलोचना करने में भाजपा सबसे आगे रहती है। लेकिन अब जब केंद्र ने एक बहुुप्रतीक्षित ठोस कदम उठाया है तो उसका विरोध करने में भी भाजपा और उसके मुख्यमंत्री सबसे आगे हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि कानून-व्यवस्था मुख्य रूप से राज्यों का विषय है। हमारे संविधान निर्माताओं ने जिस समय संविधान की रचना की थी उस वक्त आज के आतंकवाद जैसी कोई चुनौती नहीं थी और न ही उस समय ऐसी कल्पना की जा सकती थी। इसलिए उन्होंने कानून-व्यवस्था को राज्य का विषय मानते हुए संविधान में इसी अनुरूप व्यवस्था की थी जो उचित ही थी। लेकिन आज आतंकवाद किसी एक या दो राज्यों के लिए नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र-राज्य के लिए पिछले लगभग दो दशकों से एक गंभीर चुनौती बनकर हमारे सामने है। यह एक ऐसी संगठित आपराधिक परिघटना है जिसके तार कई राज्यों में फैले हुए हैं और सरहदों के पार पड़ोसी मुल्कों में भी। इसलिए इसके मुकाबले के लिए केंद्र और राज्यों की एक समन्वित रणनीति की जरूरत लंबे समय से महसूस की जाती रही है। इस जरूरत को नक्सल समस्या के परिपेक्ष्य में भी महसूस किया जा सकता है जो कि आतंकवाद से भी बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है।
अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली आदि दुनिया के कई देशों में राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद निरोधक केंद्र वर्षों से अस्तित्व में हैं और काम कर रहे हैं। उन सभी देशों में राज्यों को जो अधिकार और स्वायत्तता हासिल है वह किसी भी तरह हमारे यहां से कम नहीं है। वहां भी केंद्र और राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें हैं। लेकिन उन देशों में इस मसले पर कभी भी केंद्र और राज्यों के बीच तकरार की नौबत नहीं आई। उन्हीं देशों की तर्ज पर केंद्र सरकार ने 26/11 को मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के बाद प्रस्तावित आतंकवाद निरोधक केंद्र के गठन की घोषणा की थी, लेकिन उस पर अमल करने में उसे तीन साल का समय लग गया। सवाल है कि इस मामले में अनावश्यक रूप से इतना विलंब होने के बावजूद इस दौरान केंद्र सरकार ने भी इस बारे में राज्यों से विचार-विमर्श क्यों नहीं किया? जब आतंरिक सुरक्षा के मसले पर केंद्र समय-समय पर राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठकें करता रहता है तो एनसीटीसी के गठन पर उनसे बातचीत करने में क्या हर्ज था? उचित तो यही होता कि इतना महत्वपूर्ण कदम उठाने के बारे में केंद्र सरकार अपने गठबंधन के सदस्य दलों और राज्य सरकारों को भी विश्वास में ले लेती। ऐसा करने से वह इस मामले में अपनी फजीहत से बच सकती थी। यह समझ से परे है कि लोकपाल विधेयक और खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश जैसे महत्वपूर्ण मसलों पर इसी तरह मुंह की खाने के बावजूद यूपीए सरकार और कांग्रेस यह क्यों भूल जाती है कि केंद्र और राज्यों में सत्ता पर उसके एकाधिकार के वे दिन कब के लद गए हैं जब केंद्र कोई कोई फैसला करता था और राज्य सरकारें चुपचाप उसे मान लेती थी।
 जिन राज्य सरकारों और राजनीतिक दलों ने एनसीटीसी के गठन पर हायतौबा मचाई, उसमें राज्यों के अधिकारों की चिंता कम और भविष्य के राजनीतिक समीकरणों की झलक ज्यादा दिखाई दी है। यही वजह है कि आतंकवाद के खिलाफ हमेशा मुखर दिखने वाली भाजपा ने भी पहली बार एनसीटीसी के खिलाफ अपना मुंह खोला। लेकिन ऐसा करते वक्त वह यह तथ्य भूल गई कि एनसीटीसी के गठन का फैसला 2001 में राजग सरकार के समय भी हुआ था और फैसला लेने वाले थे उस सरकार के गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी। अब वह राजनीतिक अवसरवाद का परिचय देते हुए दो साल बाद होने वाले लोकसभा के चुनाव के मद्देनजर गैर कांग्रेसी दलों को अपने गठबंधन में शामिल करने का सपना बुनती दिख रही है। उसे लगता है कि एनसीटीसी के गठन पर एतराज जताने वाले नवीन पटनायक, ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू जैसे ताकतवर क्षत्रप गैर कांग्रेसवाद के नाम पर फिर से राजग की छतरी तले आ सकते हैं। लेकिन एक नए राजनीतिक मोर्चे गठन की संभावना तलाशने के जुनून में आतंकवाद जैसे गंभीर मोर्चे पर उसकी इस तरह की राजनीतिक कलाबाजी निश्चित ही अफसोसनाक हैं और आतंकवादियों के हौसले बुलंद करने वाली भी।

Monday, February 6, 2012

भाजपा को फिर राम याद आए


अगर भारतीय जनता पार्टी को एक मुद्दे वाली पार्टी की छवि से छुटकारा दिलाने में उसके नेतृत्व की ही कोई दिलचस्पी नहीं हो तो कोई क्या कर सकता है? पिछले लगभग ढाई दशक से लोकसभा और उत्तर प्रदेश विधानसभा का ऐसा कोई चुनाव नहीं रहा जिसमें भाजपा ने अयोध्या में राम मंदिर बनाने का वादे को अपने घोषणापत्र में जगह न दी हो। इस बार भी आखिरकार उससे रहा नहीं गया और यह जानते हुए भी कि अयोध्या का मस्जिद बनाम मंदिर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है, उसने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए अपना घोषणा पत्र में यह घोषणा कर ही डाली कि पार्टी अयोध्या में राम मंदिर बनाने के रास्ते में जो भी बाधाएं हैं उन्हें दूर कर एक भव्य राम मंदिर का निर्माण करेगी।
एक समय भाजपा की उग्र हिंदूवाद की राजनीति के चैंपियन रहे लालकृष्ण आडवाणी भी चुनाव प्रचार के सिलसिले में अयोध्या यात्रा कर आए हैं। उन्होंने अयोध्या में रामलला के दर्शन करने के बाद चुनाव सभा में कहा, 'अयोध्या में भव्य राम मंदिर बने, यह मेरे जीवन की साध है। जब तक यह नहीं बनेगा, मेरे मन को संतोष नहीं मिलेगा।' आडवाणी ही वह शख्श हैं जिन्होंने कोई दो दशक पूर्व सोमनाथ से अयोध्या तक की अपनी राम रथयात्रा के जरिए देशभर में उन्मादी माहौल बनाकर भाजपा के लिए सत्ता में पहुंचने का रास्ता तैयार किया था। राम मंदिर मुद्दे के सहारे ही भाजपा ने लोकसभा में अपनी सदस्य संख्या दो से बढ़ाकर पहले 89  फिर 110 और बाद में 150 तक पहुंचाई और केंद्र में गठबंधन सरकार बनाई। लेकिन सत्ता में रहते हुए अपने गठबंधन के सहयोगियों के दबाव में भाजपा को अपनी हिंदूवादी राजनीति के अन्य विवादास्पद मुद्दों के साथ ही राम मंदिर का मुद्दा भी ठंडे बस्ते में डालना पड़ा। तभी से यह मुद्दा अपनी रंगत लगातार खोता गया।
इस मुद्दे को देश की राजनीति में बेअसर हुए अब एक दशक से भी ज्यादा का समय हो चुका है और इस दौरान भाजपा दो मर्तबा लोकसभा और इतनी ही दफा उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव हार चुकी है। फिर भी 'दिल है कि मानता नहीं' की तर्ज पर वह हर चुनाव के मौके पर इस मुद्दे को झाड़-पोंछकर अपने घोषणा पत्र में सजा लाती है। इस बार भी वह इसी मुद्दे के जरिए उत्तर प्रदेश के मतदाताओं को रिझाना चाहती है। जबकि सब जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को अजीबो-गरीब बताते हुए उसके अमल पर रोक लगा रखी है, जिसमें अयोध्या के विवादित भूखंड को तीन हिस्सों में बांटने की बात कही गई थी। हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे तीनों ही पक्ष दरअसल उस न्याय की तलाश में हैं जो उन्हें अपने हिसाब से सही लगता है। सुप्रीम कोर्ट के सामने भी साफ है कि सभी पक्षकार मामले का न्याय या शांतिपूर्ण समाधान नहीं, बल्कि अपने न्याय के लिए लड़ने का अधिकार हासिल करना चाहते हैं। इसलिए उसने मामले को एक तकनीकी कानूनी मुद्दा बनाकर पक्षकारों को यह सुविधा दे दी है। अब सभी पक्षकार जब तक चाहें, जिस तरह से चाहें, अदालत में अपनी याचिकाएं लगा सकते हैं।
 दरअसल, सामाजिक दृष्टि से ऐसे विस्फोटक मसलों का समाधान अदालतों के द्वारा हो भी नहीं सकता। इसीलिए यह मामला विभिन्न नीची-ऊंची अदालतों से होता हुआ फिलहाल सुुप्रीम कोर्ट में है, जहां वह कब तक चलेगा, यह कोई नहीं कह सकता, खुद सुप्रीम कोर्ट भी नहीं। यदि फैसला बाबरी मस्जिद के पक्षकारों के खिलाफ गया, जिसकी संभावना कम ही है, तो हो सकता है कि मुस्लिम समुदाय उसे स्वीकार कर ले, जैसा कि उसके नुमाइंदों की ओर से लगातार कहा भी जाता रहा है। लेकिन अगर फैसला राम मंदिर के पक्षकारों के खिलाफ होता है तो संघी कुनबा उसे कतई स्वीकार नहीं करेगा। उसके नेता फिर वही राग अलापेंगे कि यह हमारे लिए धार्मिक आस्था का सवाल है और राम का जन्म कहां हुआ था, यह अदालत से तय नहीं हो सकता। संघ परिवार को यह अच्छी तरह मालूम है कि कानूनी रूप से उनका पक्ष उतना मजबूत नहीं है, जितना बाबरी मस्जिद के पक्षकारों का है। यही वजह है कि संघ परिवार और राजग सरकार ने भी कभी कोशिश नहीं कि इस पूरे मसले का न्यायिक समाधान जल्द से जल्द हो जाए।
अब सुप्रीम कोर्ट का भी जब कभी इस मामले में जो फैसला आएगा, वह सर्वमान्य नहीं होगा और विवाद अपनी जगह कायम रहेगा। इसलिए इस मसले का कोई भी हल अदालत के बाहर दोनों समुदायों के बीच समझौते से ही संभव है। लेकिन दोनों ही पक्षों ने ऐसा करने में अभी तक कोई रूचि नहीं दिखाई है। हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, भारतीय जनता पार्टी आदि के नेता अपने बयानों में जरूर यह इच्छा जताते रहते हैं, जिससे यह भ्रम होता है कि संघी कुनबा जल्द से जल्द राम मंदिर बनाना चाहता है, लेकिन दरअसल राम मंदिर बनाने की जल्दी किसी को नहीं है। यह इसी से जाहिर है कि बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुए लगभग दो दशक हो चुके हैं, फिर भी मंदिर बनाने की कोई मुहिम शुरू नहीं हो पाई है। बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद के कुछ वर्षों तक जरूर मंदिर बनाने के लिए देश भर से ईटें और चंदा जुटाने का कार्यक्रम चलाया गया तथा राम मंदिर के नए-नए मॉडल भी बनाए जाते रहे, लेकिन बाबरी मस्जिद को ढहाने के लिए जो उत्साह दिखाया गया, वह राम मंदिर बनाने के लिए कभी नहीं दिखाया गया। दिखाया भी नहीं जा सकता, क्योंकि जिस तरीके से बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया गया, उस तरीके से राम मंदिर नहीं बनाया जा सकता।
 अयोध्या में जिस जगह बाबरी मस्जिद थी, वहां मंदिर तो अब तभी बन सकता है जब हिंदुओं और मुसलमानों के बीच कोई समझौता हो जाए। ऐसा नहीं है कि यह समझौता नहीं हो सकता। हो सकता था और आज भी हो सकता है, यदि यह मामला शुद्घ रूप से धार्मिक होता और विश्व हिंदू परिषद ने इसे उसी स्तर पर उठाया होता। भारत के मुसलमान इतने तंगदिल भी नहीं हैं कि वे अपने हिंदू भाई-बहनों की धार्मिक इच्छा का सम्मान न कर सकें। लेकिन हुआ यह कि जब इस मुद्दे को स्थानीय स्तर से ऊपर लाया गया, तभी से शक्ति प्रदर्शन का मामला बना दिया गया। संघ परिवार की ओर से हमेशा यह जताया गया कि हमें किसी की अनुकंपा से राम मंदिर नहीं चाहिए, वह जमीन तो हमारी ही है और हम उसे अपनी ताकत के बल पर लेकर रहेंगे। संघ परिवार के इसी रवैये ने मुस्लिम कट्टरपंथ के लिए खाद-पानी का काम किया। वैसे देश के आम मुसलमानों को बाबरी मस्जिद से न पहले कोई लेना-देना था और न ही आज कुछ लेना-देना है, लेकिन अयोध्या के सवाल पर संघ परिवार के आक्रामक रवैये ने उनके दिल-दिमाग में यह आशंका जरूर पैदा कर दी है कि अगर आज सद्‌भावना दिखाते हुए उन्होंने अयोध्या की विवादित भूमि पर अपना दावा छोड़ दिया तो कल देश में उनकी दूसरी इबादतगाहों पर भी संघ परिवार इसी तरह अपना दावा जताने लगेगा। उनकी यह आशंका निराधार भी नहीं है, क्योंकि संघ परिवार ने ऐसे मामलों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार कर रखी है और उसका यह नारा 'अयोध्या तो झांकी है, मथुरा-काशी बाकी है' भी न सिर्फ मुसलमानों को बल्कि देश के हर अमन और भाईचारा पसंद व्यक्ति को डराता है।
 दरअसल, मामले की मौजूदा कानूनी स्थिति और राजनीतिक-सामाजिक हकीकत के मद्देनजर अयोध्या में राम मंदिर बनना तब तक नामुमकिन है जब तक भारत में संवैधानिक या अन्य किसी किस्म का फासीवाद कायम नहीं हो जाता। अगर सामान्य तरीके से यह मंदिर बनाया जा सकता होता तो बाबरी मस्जिद तोड़ने के लिए फासीवादी तरीके अपनाने की और अदालत में झूठा हलफनामा दाखिल करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। अब इसमें किसी को कोई शक नहीं रह जाना चाहिए कि संघी कुनबे का राम मंदिर अभियान उसकी उस व्यापक मानसिकता और मांग पत्र का हिस्सा है, जिसके बाकी हिस्से कभी गोहत्या पर पाबंदी की मांग, कभी धर्मांतरण रोकने के लिए कानून, कभी ईसाई मिशनरियों को देश निकाला देने की मुहिम, कभी गिरजाघरों, पादरियों और ननों पर हमले, कभी धार की भोजशाला हिंदुओं के सुपुर्द करने की मांग, कभी श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने की जिद, कभी धारा 370 को हटाने की मांग, कभी समान नागरिक संहिता और कभी स्कूलों में वंदे मातरम और सरस्वती वंदना का गायन अनिवार्य करने की मांग के रूप में सामने आते हैं। इनमें से कोई एक मुहिम परिस्थितिवश कमजोर पड़ जाती है तो दूसरी को शुरू कर दिया जाता है।
 इस बात को ध्यान में रखने पर ही समझा जा सकता है कि भाजपा जब तक वह केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार का नेतृत्व करती रही, उसने अपने तीन परमप्रिय मुद्दों को भले ही स्थगित रखा हो, लेकिन इन मुद्दों के पीछे जो कथित हिंदूवादी एजेंडा है, उसका परित्याग कभी नहीं किया। अब चूंकि उत्तरप्रदेश विधानसभा होने जा रहे हैं और पार्टी वहां अपनी खोई हुई जमीन फिर से हासिल करना चाहती है। इसलिए भाजपा समेत समूचे संघ परिवार को जनता के इस सवाल का जवाब देने के लिए कुछ तो तैयारी करनी ही होगी कि दो दशक बाद भी अयोध्या में वह राम मंदिर क्यों नहीं बनाया जा सका, जिसके लिए बाबरी मस्जिद तोड़ी गई थी। भाजपा नेतृत्व के लिए इस आरोप का बोझ अपने सिर पर लेकर चलना मुश्किल होगा कि वे अपने आराध्य राम को भूल गए हैं। इसीलिए भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने भी कुछ दिनों पहले अयोध्या से ही अपनी पार्टी के चुनाव अभियान की शुरूआत की थी। उन्होंने वहां रामलला के दर्शन करने के बाद आयोजित रैली में उत्तर प्रदेश में मायावती के रावण राज्य का अंत कर राम राज्य की स्थापना का आह्वान किया था और यह हुंकार भी लगाई थी-'सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर यहीं बनाएंगे।' लेकिन यह मंदिर वह कब और कैसे बनाएंगे, यह कोई नहीं जानता, खुद गडकरी और आडवाणी भी नहीं।
                                             

Tuesday, January 24, 2012

सिर्फ राष्ट्रीय शर्म बताना ही काफी नहीं



लंबे समय से भारत ऐसा देश रहा है, जहां एक ओर तो सम्पन्नता और समृध्दि के द्वीप जगमगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर घोर बदहाली का महासागर हिलोरे मार रहा है। बीते दो दशकों से यानी नव उदारीकृत आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद से यह फासला और बढ़ा है। एक छोटा तबका आला दर्जे के ऐशो-आराम वाली जीवनशैली के मजे ले रहा है और दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में हमारे देश के धनकुबेर शामिल हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को भरपेट भोजन तक मयस्सर नहीं है। हमारे लगभग आधे बच्चे कुपोषित हैं। 'एक ओर देश में हर साल उचित भंडारण के अभाव में लाखों टन अनाज सड़ जाता है जबकि दूसरी ओर करोड़ों भारतीयों को भूखे पेट सोना पड़ता है।' यह कहते हुए कोई एक साल सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई थी लेकिन उसके बाद भी हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। भंडारण की बदइंतजामी के चलते अनाज के सड़ने और लोगों के भूख से मरने का सिलसिला लगातार जारी है।
कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के जरिए भारत में कुपोषण की व्यापकता सामने आ चुकी है और अब एक अन्य सर्वेक्षण ने भी इस भयावह हकीकत की तसदीक की है। कई दलों के सांसदों और विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हस्तियों की एक संस्था द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण की रिपोर्ट जारी करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश में कुपोषण की स्थिति को राष्ट्रीय शर्म का विषय करार दिया है। इस सर्वेक्षण का निष्कर्ष है कि पिछले सात वर्षों में बच्चों में व्याप्त कुपोषण में बीस फीसदी की कमी आई है लेकिन अभी भी देश के 42 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। चूंकि बच्चों को आने वाले कल की बुनियाद माना जाता है, इसलिए यह हमारे लिए बेहद चिंता की बात है, क्योंकि हमारे देश के भविष्य की बुनियाद ऐसे बच्चों के रूप में तैयार हो रही है जो कुपोषित हैं, कमजोर हैं और जिनके बीमार होने की आशंका अधिक है। चूंकि यह सर्वेक्षण देश के महज नौ राज्यों के 112 जिलों में 73 हजार परिवारों को आधार बनाकर किया गया है, लिहाजा इसे देश में कुपोषण की मुक्कमिल तस्वीर नहीं माना जा सकता, जो कि और भी भयावह हो सकती है।
कुपोषण का मतलब केवल भोजन का अभाव नहीं बल्कि इस अभाव से पैदा होने वाली विकृतियां भी हैं। इसका मतलब मजबूरी में मिला ऐसा भोजन जो तात्कालिक रूप से भूख के राक्षस को तो पटक देता है लेकिन जिंदगी की गाड़ी सुचारू रूप से चलाने के लिए शरीर को जिन तत्वों की जरूरत होती है, वे इससे गायब रहते हैं। इसलिए 42 फीसदी बच्चों के कुपोषित होने की हकीकत जानकर शर्म आना तो लाजिमी है ही, देश के भविष्य की सोच कर डर भी लगता है। कुपोषण का यह आंकड़ा देश में गरीबी रेखा से नीचे किसी तरह गुजर-बसर कर रही आबादी के आसपास का है जो बता रहा है कि गरीबों की झोपड़ी में कैसे देश का लाचार-बीमार भविष्य पनप रहा है।  
ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2011 में (दुनिया के 81 विकासशील और पिछड़े मुल्कों में) भारत का स्थान 67 वां है, जबकि बांग्लादेश का 68 वां। दुनिया के महज 14 देश ही हमसे पीछे हैं। चीन, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, वियतनाम जैसे एशियाई देशों के अलावा रवांडा और सूडान, जैसे देश भी इस मामले में भारत से बेहतर स्थिति में नजर आते हैं, जबकि भारत की छवि तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था की बनी हुई है। हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री ने इस बात पर चिंता और हैरानी जताई है कि कई सालों से ऊंची विकास दर हासिल करते रहने के बावजूद ऐसे हालात क्यों बने हुए हैं। दरअसल, ऊंची विकास दर अर्थव्यवस्था की गतिशीलता का पैमाना तो हो सकती है लेकिन यह हाशिए पर जी रहे लोगों की बेहतरी की गारंटी नहीं हो सकती। यही वजह है कि राष्ट्रीय औसत से ज्यादा विकास दर और औद्योगिक रूप से ज्यादा विकसित माने जाने वाले गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में भी कुपोषण की व्यापकता देश के पिछड़े कहे जाने वाले राज्यों जैसी ही है, जिसका खुलासा कुछ दिनों पहले जारी हुई योजना आयोग की मानव विकास रिपोर्ट से हुआ था। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश के एक तिहाई लोग और करीब 50 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।
 प्रधानमंत्री ने कुपोषण की मौजूदा स्थिति को शर्मनाक बताते हुए देश को एक और तल्ख हकीकत से रूबरू कराया है। वह यह कि कुपोषण उन्मूलन के लिए शुरू की गई 'एकीकृत बाल विकास परियोजना' अपेक्षित नतीजे नहीं दे पाई। दुनिया के तमाम गरीब देश कुपोषण की समस्या का सामना कर रहे हैं और संयुक्त राष्ट्र ने इस समस्या के अंत के लिए वर्ष 2015 की डेडलाइन भी तय कर रखी है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अपने देश में इस लक्ष्य का हासिल करने में अभी लगभग चौथाई सदी यानी 25 साल से भी ज्यादा का समय लगेगा। तेजी से विकास कर रहे चीन को देख कर हम भले ही ईष्या या कुंठा पाल लें, लेकिन हमें उस देश से सीखना चाहिए कि उसने अपने यहां कुपोषण खत्म करने का काम संयुक्त राष्ट्र की तय समय सीमा से पहले ही कैसे पूरा कर लिया। हम इस मोर्चे पर कितने मुस्तैद हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कुपोषण के खिलाफ अभियान छेड़ने के लिए खुद प्रधानमंत्री की पहल पर लगभग डेढ़ साल पहले एक उच्च स्तरीय समिति का गठन हुआ था लेकिन आज तक उसकी कोई बैठक ही नहीं हुई। कुपोषण के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए 'आंगनबाड़ी' जैसी योजना भी बनी है लेकिन वह भी उपेक्षा के दलदल से निकल ही नहीं पा रही है। आंगनबाड़ी केंद्रों में कार्यकर्ताओं की कमी, अस्वच्छ वातावरण, शौचालय और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव तथा गंदगी में रखी गई भोजन सामग्री जैसे हालात ने उस योजना का सत्यानाश कर रखा है, जो कुपोषण की समस्या का काफी हद तक उन्मूलन कर सकती थी।
कुपोषण एक तरह से धीमे जहर के समान है जो शरीर को जिंदा तो रखता है लेकिन उसे भीतर से खोखला भी बनाता रहता है। इसकी अनदेखी से भविष्य ही प्रभावित नहीं होता है बल्कि वर्तमान को भी बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों को भी कुपोषण रूपी इस दैत्य से उलझना पड़ा था। मैक्सिको, ब्राजील और घाना जैसे देशों ने इस दैत्य का मुस्तैदी से सामना किया तो उन्हें बेहतर नतीजे भी मिले। प्रधानमंत्री द्वारा समस्या को गंभीर और शर्मनाक बताने भर से उसका निदान नहीं हो सकता। विकास के हमारे मौजूदा मॉडल में आर्थिक प्रगति और विकास का लाभ छनकर समाज के निचले तबकों में अपने आप नहीं पहुंचता। इसीलिए खाद्य सुरक्षा कानून और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी मनरेगा जैसी योजनाओं और कार्यक्रमों की जरुरत पड़ती है। लेकिन अनियमितताओं और भ्रष्टाचार से सनी इन योजनाओं के जरिए किसी तरह हम मानवीय अस्तित्व ही बचा पा रहे हैं, भावी पीढ़ी नहीं। इसलिए भावी पीढ़ी को बचाने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय अभियान की दरकार है जिसमें सरकारों के साथ ही समाज के सक्षम तबकों और कॉरपोरेट जगत को भी उत्साह के साथ आगे आकर शिरकत करनी चाहिए।

Tuesday, January 3, 2012

अण्णा आंदोलन के आगे का रास्ता


भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सशक्त लोकपाल बनाने की मांग को लेकर पहले तीन दिन और फिर बारह दिन का अनशन करने वाले अण्णा हजारे ने तीसरी बार न सिर्फ अपना अनशन बीच में ही खत्म कर दिया बल्कि प्रस्तावित जेल भरो आंदोलन का ऐलान भी वापस ले लिया। उनके इस फैसले के पीछे कई वजहें हैं और उसके कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। इस फैसले में उनकी सेहत का खराब होना भी एक मुख्य वजह है। लेकिन इस आंदोलन को बीच में रोकने के पीछे कहीं न कहीं वैसा अपेक्षित जनसमर्थन न मिलना भी एक कारण है, जैसा गत अगस्त में दिल्ली में रामलीला मैदान में मिला था। दरअसल, कोई भी आंदोलन बगैर जनसमर्थन के कामयाब नहीं हो सकता। अण्णा के आंदोलन को इस बार इसी मुश्किल से रूबरू होना पड़ा है और जो फैसला कुछ पहले लिया जा सकता था उसे लेने में थोड़ी देर हो गई। वैसे किसी भी आंदोलन में गलतियां होना स्वाभाविक है और अण्णा हजारे की टीम से भी गलतियां हुई।
संसद सत्र के दौरान अनशन और फिर जेल भरो आंदोलन का ऐलान किसी भी तरह से तार्किक और औचित्यपूर्ण नहीं था। उन्हें संसद में विधेयक पेश होने और उसके नतीजे का इंतजार करना चाहिए था। वैसे संसद की कार्यवाही के दौरान किसी मुद्दे पर अनशन करना या धरना देना कोई नई बात नहीं है। संसद के हर सत्र के दौरान दिल्ली में कई रैलियां और प्रदर्शन होते हैं। सही समय पर अपनी बात रखना, संसद को सही फैसला करने की चेतावनी लोकतंत्र में अनुचित नहीं कहा जा सकता। लेकिन अण्णा हजारे के आंदोलन पर यह बात लागू नहीं होती, क्योंकि संसद अपने पिछले सत्र में उन्हें आश्वासन दे चुकी थी और उसके बाद भी अण्णा और उनके साथी मीडिया के माध्यम से सरकार को लगभग रोजाना ही चेतावनी दे रहे थे। इसलिए उन्हें संसद के फैसले का इंतजार करना चाहिए था। अण्णा समूह द्वारा आजाद मैदान में अनशन की अनुमति के दायर याचिका को खारिज करते हुए बंबई हाईकोर्ट ने भी इसी आशय की टिप्पणी की थी।
दरअसल अण्णा की टीम रामलीला मैदान के आंदोलन जैसी कामयाबी को मुंबई के एमएमआरडीए मैदान में भी दोहराना चाहती थी, लेकिन मुंबई में अण्णा के अनशन के पहले ही दिन जुटी मामूली भीड़ से उसे इस हकीकत का अहसास हो गया कि इतिहास कभी भी अपने को दोहराता नहीं है। हालांकि अगस्त में अण्णा के समर्थन में रामलीला मैदान में जितने लोग जुटे थे उससे कई गुना ज्यादा लोग ऐसे थे, जिन्होंने सड़कों पर उतरे बगैर ही अण्णा को समर्थन दिया था। इस परोक्ष समर्थन का भाव यह था कि अण्णा और उनके साथी जो कह रहे हैं और कर रहे हैं वह बिल्कुल सही है। अण्णा की टीम को अगस्त में मिले प्रत्यक्ष समर्थन में दिसंबर आते-आते जो कमी आई है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि परोक्ष समर्थन में भी कुछ न कुछ कमी तो आई ही होगी। जनसमर्थन में इस कमी का मतलब यह नहीं लगाया जा सकता कि लोगों का अण्णा हजारे की व्यक्तिगत ईमानदारी या उनकी विश्वसनीयता पर भरोसा कम हुआ है। अण्णा की आंदोलनात्मक रणनीति में कोई गलती हो सकती है, राजनेताओं के बारे में उनके असंयमित बयानों पर भी ऐतराज किया जा सकता है लेकिन उनकी सादगी और ईमानदारी निर्विवाद रूप से असंदिग्ध है। मगर यही बात अण्णा की टीम के बाकी सदस्यों के बारे में कोई दावे से नहीं कह  सकता।
 दरअसल अण्णा के आंदोलन में शुरु से कुछ कमजोरियां रहीं हैं। अण्णा के कुछ सहयोगी तो आंदोलन के चलते मीडिया में अपने को मिले महत्व से इतने अधिक बौरा से गए कि वे अपने को अण्णा से बड़ा नहीं तो उनके समकक्ष तो मानने ही लगे। उनकी दबी-छिपी राजनीतिक दलीय प्रतिबध्दता और महत्वाकांक्षाएं भी हिलोरें मारने लगी। उनके और विपक्षी (भाजपा) नेताओं के सरकार और कांग्रेस विरोधी बयानों में कोई फर्क नहीं रहा। इस तरह के उनके दंभी और निहित स्वार्थ भरे रवैये से कई लोगों को यह अहसास होने लगा कि यह आंदोलन महज भ्रष्टाचार या व्यवस्था के विरुद्घ ही नहीं बल्कि एक पार्टी विशेष के खिलाफ भी हो गया है। हिसार लोकसभा उपचुनाव में उनके कांग्रेस के खिलाफ धुआंधार प्रचार ने भी लोगों के इसी अहसास को पुष्ट किया। खुद अण्णा ने भी जाने-अनजाने अपने बयानों से लोगों के इस अहसास को मजबूत ही किया।
अण्णा ने अपना अनशन और जेल भरो आंदोलन वापस लेने की घोषणा करते हुए कहा है कि वे अब विधानसभा चुनाव वाले पांच राज्यों में जाकर लोगों का आह्वान करेंगे कि वे मजबूत लोकपाल विधेयक के विरोधियों को हराएं। उनका यही फैसला उनके आंदोलन का सबसे बड़ा भटकाव है। यह रास्ता आंदोलन को दलीय राजनीति के रास्ते पर ले जाने वाला है। वैसे राजनीति के रास्ते पर जाने में कोई बुराई भी नहीं है, क्योंकि अगर आप किसी राजनीतिक व्यवस्था से आंदोलन के जरिए कुछ करवाना चाहते हैं तो उस व्यवस्था को चुनाव के मैदान में चुनौती देना भी आंदोलन की एक तार्किक परिणति ही है। मगर, सवाल उठता है कि कौन सी ऐसी पार्टी है जो अण्णा की अपेक्षा के अनुरूप मजबूत लोकपाल चाहती है? संसद में लोकपाल विधेयक पर बहस के दौरान जो कुछ हुआ उसे देखकर तो यही जाहिर हुआ कि कोई भी पार्टी नहीं चाहती थी कि लोकपाल विधेयक पारित हो। सभी पार्टियों की भाव-भंगिमा बता रही थी कि वे तो सिर्फ यह चाहती थीं कि विधेयक पारित न हो पाने की तोहमत उन पर न लगे।
अण्णा ने चुनाव वाले राज्यों में यानी राजनीति के मैदान में जाने का फैसला किया है तो बेहतर होगा कि वे अपने उम्मीदवार भी चुनाव में उतारें। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो वे जो भी मुहिम चलाएंगे, उसका लाभ कांग्रेस विरोधी राजनीतिक पार्टियों को ही मिलेगा। ऐसा होने पर उनके आंदोलन पर लग रहे इस आरोप की पुष्टि ही होगी कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा द्वारा प्रायोजित आंदोलन है। हालांकि चुनाव के नतीजों को अण्णा की अपील प्रभावित कर पाएगी, इस बारे में भी संदेह की पर्याप्त गुंजाइश है। इस संदेह की पुष्टि पिछले दिनों अण्णा के गृह राज्य महाराष्ट्र में हुए स्थानीय निकाय चुनावों से भी होती है, जिनमें अण्णा के मुखर विरोधी शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने अपनी जीत का परचम फहराया है। दरअसल, चुनाव नतीजों को अपने अनुकूल प्रभावित करने के लिए जिस संगठन कौशल और रणनीतिक दांव-पेंचों की दरकार होती है वे अण्णा की टीम के पास नहीं है। अण्णा के सहयोगियों की समस्या यह है कि वे अपने समर्थन में जुटने वाली भीड़ को ही अपनी संगठन-शक्ति मानते हैं।
अण्णा अपने को गांधीवादी मानते हैं। गांधी की शिक्षा के अनुरूप उन्होंने आंदोलन के दौरान लगातार इस बात पर जोर दिया है कि हिंसा न हो। यह अच्छी बात है लेकिन उन्हें गांधी से कुछ और भी सीखना चाहिए। गांधी ने जब भी किसी मुद्दे को उठाया, उसमें सांकेतिक विजय मिलने के साथ ही एक नए मुद्दे को हाथ में लिया। कभी भी किसी आंदोलन को उसकी अंतिम परिणति तक नहीं घसीटा। अण्णा के आंदोलन का अभी तक का सफर कामयाब रहा है। देश का हर व्यक्ति यह मान चुका है कि लोकपाल नाम की एक संस्था देश में होनी चाहिए। यह कोई कम बड़ी कामयाबी नहीं है। लोकपाल विधेयक लोकसभा में जैसे-तैसे पारित होने के बाद राज्यसभा में सरकार व उसके सहयोगी और विपक्षी दलों की बाजीगरी के चलते भले ही पारित न हो सका हो मगर उसके पारित होने की संभावनाएं अभी भी खत्म नहीं हुई है। अब वह संसद के बजट सत्र में पारित हो या बाद में किसी और सत्र में लेकिन उसका पारित होकर कानून बनना तो तय है। भले ही वह अण्णा हजारे के आंदोलन की अपेक्षाओं के पूरी तरह अनुरूप न हो, लेकिन जिस रूप में भी पारित होकर कानून की शक्ल अख्तियार करेगा, उससे कुछ जड़ता तो टूटेगी ही और उसका श्रेय अण्णा के आंदोलन से पैदा हुई देशव्यापी जनचेतना और सरकार तथा राजनीतिक दलों पर बने जनदबाव को ही जाएगा। इसलिए बेहतर तो यही होगा कि अण्णा चुनाव मैदान में इस या उस पार्टी का विरोध करने के बजाय अपने आंदोलन के स्वरूप को व्यवस्था विरोधी ही रखते हुए उसके लिए नई जमीन की तलाश करें। यही गांधी का रास्ता है।